Taral Padarth Bhap Mein Kaise Badalate Hai तरल पदार्थ भाप में कैसे बदलते है ?

Taral Padarth Bhap Mein Kaise Badalate Hai

बरसात के दिनों में सड़कों और गलियों में भरा पानी कुछ ही घंटों में सूख जाता है । इसी प्रकार गर्मियों में गीले कपड़े कुछ ही समय में सूख जाते हैं । खुले बर्तनों में रखा पानी कम हो जाता है । क्या तुम जानते हो कि यह पानी कहां चला जाता है ? हम कहते हैं कि पानी भाप बनकर उड़ गया या पानी का वाष्पीकरण हो गया ।
       वाष्पीकरण कैसे होता है ? इस बात को समझने के लिए हमें पदार्थ की संरचना के विषय में जानना होगा । प्रत्येक पदार्थ (Padarth) अणुओं से मिलकर बना होता है और इन अणुओं के बीच में आकर्षण बल होता है । इस बल को संशक्ति बल ( Cohesive Force ) कहते हैं । इसी बल के द्वारा अणु एक दूसरे से आपस में बंधे रहते हैं और तितर – बितर नहीं होते । जब यह आकर्षण – बल बहुत अधिक होता है , तब पदार्थ (Padarth) ठोस अवस्था में रहता है । जब हम पदार्थ (Padarth) को गर्म करते हैं , तब पदार्थ के अणु अधिक गतिशील हो जाते हैं ।

अणुओं की यह गति उनके बीच के आकर्षण – बल को कम करने लगती है , अर्थात अणुओं की यह गति उन्हें अलग – अलग करने की कोशिश करती है । जब अणुओं  की गति से पैदा हुआ बल , उन्हें आपस में जोड़े रखने वाले संशक्ति ( Cohesion ) बल के बराबर हो जाता है , तब पदार्थ ठोस अवस्था से तरल अवस्था में बदलना शुरू कर देता है । यदि तरल को और अधिक गर्म किया जाए , तब उष्मा द्वारा अणुओं की गति का बल संशक्ति – बल से अधिक होता जाता है और तरल पदार्थ , गैस में बदलना शुरू हो जाता है ।

अर्थात उसके अणु मुक्त होकर हवा में जाने लगते हैं । द्रव की सतह से अणुओं का मुक्त ही वाष्पीकरण कहलाता है । सामान्यतः वाष्पीकरण हर तापमान पर होता रहता है , लेकिन जैसे – जैसे तापमान बढ़ता है , वाष्पीकरण और तेजी से होने लगता है । इसी क्रिया के फलस्वरूप गीले कपड़े छाया में देर में सूखते हैं और धूप में जल्दी सूख जाते हैं , क्योंकि धूप में अधिक गर्मी से अणुओं की गति भी तेज हो जाती है और पानी वाष्प बनकर तेजी से उड़ जाता है ।

Ise Bhi Padhe- तांबा हमारे लिए किस प्रकार उपयोगी है ?

Tamba Hamare Liye Kis Prakar Upayogi Hai तांबा हमारे लिए किस प्रकार उपयोगी है ?

Tamba Hamare Liye Kis Prakar Upayogi Hai

तांबा (Tamba) ( Copper ) एक ऐसी धातु है , जिसका पता मनुष्य ने पाषाणकाल के अंत में ही लगा लिया था । यह प्रकृति में दाने या पिंडों के रूप में मिलता है । शायद मानव को यह धातु पिंडरूप में ही मिला होगा । इसा से 6000 वर्ष पूर्व मनुष्य तांबे के औजार , हथियार और आभूषण प्रयोग में लाने लगा था । ईसा से लगभग 4000 वर्ष पूर्व मनुष्य ने तांबे को खानों से निकालना शुरू कर दिया था । हजारों वर्ष तक तांबा (Tamba) ही एक ऐसी धातु थी , जिसका प्रयोग मनुष्य करता रहा । इसके बाद जब आदमी को यह पता चला कि तांबा और टिन को मिलाकर कांसा नाम की मिश्र धातु बनती है , जो तांबे से अधिक सख्त होती है , तब उसने कांसे को प्रयोग मे लाना शुरू किया ।
       पिछले सौ वर्ष में तांबे का उपयोग बहुत बढ़ गया है । इसका बहुत अधिक उपयोग तार बनाने में होता है । इसका कारण यह है कि यह एक मुलायम धातु है , जिससे इसके तार आसानी से खींचे जा सकते हैं । यह विद्युत और ऊष्मा का बहुत अच्छा चालक ( Conductor ) है । संसार में हर वर्ष हजारों टन तांबा बिजली के तार बनाने के प्रयोग में आता है । इसे मोटर , डायनमो आदि में भी प्रयोग करते हैं । तांबे के सिक्के तो सारे संसार में चलते ही रहे हैं । विश्व का अधिकांश तांबा कनाडा , अमेरिका , चिली , जांबिया और  रूस से लाना शुरू हुआ |
      तांबा (Tamba) दूसरी धातुओं के साथ मिलकर मिश्र धातु बनाता है । इसकी दो मिश्र धातुएं मुख्य हैं । पहली कांसा और दूसरी पीतल । कांसे में 90 % तांबा , 4 % टिन तथा शेष जस्ता , सीसा और निकल होते हैं । पीतल में 70 % तांबा और 30 % जस्ता होता है । ये दोनों ही मिश्र धातुएं हमारे लिए बहुत उपयोगी हैं । इनसे बर्तन तथा उद्योगों में काम आने वाली अनेक प्रकार की मशीनों के हजारों प्रकार के कल – पुर्जे व अन्य चीजें बनाई जाती हैं । तांबा और एल्यूमिनियम से भी एक मिश्र धातु बनती है , जिसे एल्यूमिनियम ब्रोंज कहते हैं । यह धातु भी आजकल बहुत प्रयोग में आ रही है ।
      तांबा दूसरे तत्त्वों से मिलकर अनेक यौगिक बनाता है । तांबे के सभी यौगिक जहरीले होते हैं । इसलिए इन यौगिकों को कीटाणुनाशक के रूप में प्रयोग किया जाता है । जैसे कृषि में इन यौगिकों को फसलों को हानिकारक कीटाणुओं को मारने के लिए प्रयोग में लाया जाता है ।
       तांबा हमारे लिए इतना उपयोगी सिद्ध हुआ है कि दिन – प्रतिदिन संसार में इसका उत्पादन बढ़ाने के अधिक से अधिक प्रयास किए जा रहे हैं ।
       मनुष्य के शरीर में भी अल्प मात्रा में तांबा पाया जाता है । यह रक्त में हीमोग्लोबिन बढ़ाने में सहायता कर हमें स्वस्थ रखता है । इस प्रकार तांबा मानव समाज के लिए एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण धातु है ।

Ise Bhi Padhe – भेड़ से ऊन कैसे निकाली जाती है ?

Bhed Se Oon Kaise Nikali Jati Hai भेड़ से ऊन कैसे निकाली जाती है ?

Bhed Se Oon Kaise Nikali Jati Hai

सर्दियों में हम गर्म कपड़े पहनते हैं । ये गर्म कपड़े ऊन से बनाए जाते हैं । क्या आप जानते हैं कि ऊन हमें भेड़ों से कैसे प्राप्त होती है ? आइए हम बताते हैं ।
         जिस प्रकार हमारे सिर पर बाल उगते हैं , ठीक उसी प्रकार भेड़ और बकरियों के शरीर पर भी बाल उगते हैं । भेड़ – बकरियों के ये बाल ही ऊन कहलाते हैं । भेड़ (Bhed) के ये बाल ठंड से उसकी रक्षा करते हैं । इसी प्रकार लामा ( Lama ) , अल्पाका , ( Alpaca ) , ऊंट आदि अनेक पशुओं और कुछ किस्म के बकरों के बालों का भी ऊन के रूप में उपयोग होता है ।
      साल में एक बार भेड़ के बाल काटे जाते हैं । जब जाड़े का मौसम समाप्त होने को होता है और गर्मी आने को होती है , तब भेड़ (Bhed) को बालों की जरूरत नहीं होती । उसी समय भेड़ के बालों को बड़ी – बड़ी कैंचियों द्वारा काट लिया जाता है । इन बालों में कांटे , गंदगी और चिकनाई होती है । बालों को साफ करने के लिए उनके गोले बनाकर ऊन को सुतलियों से बांध दिया जाता है । अब इस ऊन की सफाई की जाती है ।

इसके बाद मशीनों की सहायता से ऊन की ऐंठन निकाली जाती है । अंत में इसे धागे के रूप में काट लिया जाता है । इसी ऊनी धागे से गर्म कपड़े बनाए जाते हैं ।
     प्राचीनकाल से ही मनुष्य भेड़ (Bhed) की ऊन और मांस का प्रयोग करता रहा है । सदियों के परिश्रम के बाद मनुष्य ने भेड़ों की कई किस्में विकसित कर ली हैं । इसमें कुछ किस्में मांस के लिए प्रयोग होती हैं और कुछ किस्में ऊन देने वाली भेड़ों की हैं । स्पेन और अफ्रीका में ‘ मेरिनो ‘ नामक भेड़ होती है , जो ऐसे लगती है जैसे ऊन की ही बनी हो । इसकी नाक और टांगें ही बिना ऊन के दिखती हैं , बाकी शरीर ऊन से ढका रहता है ।

अब अमेरिका और आस्ट्रेलिया में भी मेरिनो जाति की भेड़ें बहुत मिलती हैं , जिनसे ऊन प्राप्त की जाती है । इस जाति की भेड़ से मिलने वाली ऊन काफी गर्म होती है ।
      आस्ट्रेलिया सबसे अधिक ऊन का उत्पादन करने वाला देश है । सारे संसार की 30 % ऊन आस्ट्रेलिया से प्राप्त होती है । अमेरिका ऊन उत्पादन में दूसरे स्थान पर है ।

Ise Bhi Padhe – मोती कैसे बनते हैं ?

Moti Kaise Banate Hai मोती कैसे बनते हैं ?

Moti Kaise Banate Hai

प्राचीनकाल से ही मोतियों ने अपनी चमक और सौन्दर्य से लोगों को मोहित किया है । सच्चे मोती बहुत कीमती होते हैं , क्योंकि वे कम मिलते हैं ।
      मोती (Moti) बनने की क्रिया बहुत दिलचस्प है । समुद्र में एक छोटा सा जीव सोपी ( Oyster ) होता है । इसका ऊपरी खोल कठोर होता है , परन्तु इसके अन्दर रहने वाले जीव का शरीर बहुत कोमल होता है । जब सीप केबाहरी खोल के अन्दर बालू का कोई कण चला जाता है , तब वह सीप अन्दर रहने वाले जीव के कोमल शरीर से रगड़ता है । इससे उस जीव को तकलीफ होती है ।

इस तकलीफ को दूर करने के लिए वह जीव उस कण पर मोती जैसी चमक वाले चिकने पदार्थ की परत पर परत जमाता जाता है । यह मोती की आभा वाली परतें कैल्सियम कार्बोनेट की होती हैं । इन्हीं परतों के फलस्वरूप खोल के अन्दर मोती का निर्माण होता है । इस प्रकार बना मोती गोल , चमकदार और सफेद होता है । यही सच्चा मोती होता है । यह जरूरी नहीं कि मोती केवल सफेद ही हो । उनका रंग पीला , काला , सफेद , गुलाबी , नीलापन लिए पीला , हरा और बैंगनी भी हो सकता है ।
       मोती (Moti) की खोज की कहानी बड़ी रोचक है । लगभग चार हजार साल पहले समुद्र के किनारे एक भूखे चीनी ने खाने के लिए कुछ सीपियों को खोलना शुरू किया। इनमें से एक सीपी के अन्दर उसे एक छोटी चमकदार गोली मिली । इसी चमकदार छोटी गोली को मोती के नाम से पुकारा जाने लगा ।
      मनुष्य ने अब कृत्रिम मोती (Moti) बनाने की तकनीकों को विकसित कर लिया है । इन तकनीकों का प्रयोग कर , बालू के कण सीपी के खोल में प्रवेश करा दिए जाते हैं और उन्हें फिर से पानी में डाल दिया जाता है । कुछ साल बाद सीपी से मोती (Moti) निकाल लिया जाता है । इन मोतियों को कृत्रिम या कल्चर्ड ( Cultured ) मोती कहते हैं । जापान ने सुन्दर कृत्रिम मोतियों को बनाने की तकनीक में दक्षता प्राप्त कर ली है ।

प्राकृतिक या सच्चे मोतियों का मूल्य अधिक होता है । इसलिए अधिकतर लोग कल्चर्ड मोती खरीदते हैं । 17 मई 1934 को फिलीपीन्स में एक ऐसा मोती पाया गया , जिसका व्यास 13 सेन्टीमीटर है । इस मोती का भार लगभग 6.37 किलोग्राम है । इसे लोजी का मोती ( Pearl of Laozi ) कहते हैं । यह विश्व का सबसे बड़ा मोती है । Ise Bhi Padhe – सिलिकॉन हमारे लिए कैसे उपयोगी है |

Silicon Hamare Liye Kaise Upayogi Hai सिलिकॉन हमारे लिए कैसे उपयोगी है |

Silicon Hamare Liye Kaise Upayogi Hai

सिलिकॉन (Silicon) एक अधातु तत्व है । प्रकृति में यह शुद्ध अवस्था में नहीं मिलता । शुद्ध सिलिकॉन (Silicon) कठोर , गहरे भूरे रंग का , धातु जैसी चमक वाला और कई गुणों में हीरे से मिलता – जुलता , रवेदार पदार्थ होता है । सामान्य ताप का इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता , लेकिन अधिक तापमान पर यह अन्य तत्वों से प्रतिक्रिया करके अनेक यौगिक बनाता है । हमारी पृथ्वी की पपड़ी में 28 % और चीनी मिट्टी में 50 % सिलिकॉन होता है । यह चट्टानों , बालू , पानी और जीव – जंतुओं की हड्डियों में भी पाया जाता है । बालू में इसकी मात्रा बहुत अधिक होती है ।
    

सिलिकॉन तत्व को सिलिकॉन – डाइऑक्साइड से प्राप्त किया जा सकता है । सिलिकॉन – डाइऑक्साइड को विद्युत भट्ठी में गर्म करने पर ऑक्सीजन निकल जाती है और सिलिकॉन (Silicon) अलग हो जाता है ।
   सिलिकॉन का अधिकतर भाग सिलिका के रूप में पाया जाता है । इसे ही सिलिकॉन – डाइऑक्साइड कहते हैं । यह सिलिकॉन और ऑक्सीजन का एक यौगिक है । क्वार्ट्स ( बिल्लौर ) , जास्पर , दूधिया पत्थर और बालू आदि सभी सिलिका के ही रूप हैं । सिलीकेट सिलिका का दूसरा यौगिक है । माइका और ऐसबेस्टस सिलीकेट के रूप में मिलते हैं ।
    

  सिलिकॉन हमारे लिए बहुत उपयोगी है । अनेक प्रकार के कांच , तामचीनी , चीनी मिट्टी ( China Clay ) आदि को बनाने के लिए सिलिकेट को काम में लाते हैं । सोडियम सिलिकेट का उपयोग साबुन बनाने में , लकड़ी को सड़ने से बचाने में , अंडों को सड़ने से रोकने में और रंगाई ( Dying ) में किया जाता है । यहां तक कि इसे चिकनाहट के लिए और कृत्रिम रबर बनाने के लिए भी काम में लाया जाता है ।
       

अत्यधिक शुद्ध सिलिकॉन का प्रयोग फोटोग्राफी , ट्रांजिस्टरों और दूसरे इलेक्ट्रानिक पुों में किया जाता है । सिलिकॉन और कार्बन का एक यौगिक , जिसे सिलिकॉन कार्बाइड या कार्बोरंडम कहते हैं , धातुओं पर पॉलिश करने के काम आता है । सिलिकॉन को स्टील में मिलाकर स्टील के अर्द्धचालक ( Semiconductor ) भी बनाए जाते हैं , जो हमारे जीवन में बहुत उपयोगी सिद्ध हुए हैं ।
      बालू और मिट्टी में मिले हुए सिलिकॉन का उपयोग ईंटों के बनाने में भी किया जाता है

Ise Bhi Padhe – अमेरिका का नाम कैसे पड़ा ?

Helium Gas Kya Hai हिलियम गैस क्या है ?

Helium Gas Kya Ha

अधिकतर गैसें ऐसी हैं , जिन्हें प्रयोगशाला में तैयार किया जा सकता है , लेकिन कुछ गैसें ऐसी भी हैं , जो हमें केवल प्रकृति से ही प्राप्त होती हैं ।
         हीलियम (Helium) गैस भी एक ऐसी ही गैस है । यह एक अक्रियाशील ( inactive ) गैस है । इसमें न रंग होता है , न गंध और न स्वाद । हीलियम की कुछ ऐसी विशेषताएं हैं , जिनके कारण यह हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध हुई है । हल्केपन में इस गैस का हाइड्रोजन के बाद दूसरा स्थान है , लेकिन इसकी विशेषता है कि यह आग नहीं पकड़ती , जबकि हाइड्रोजन आग पकड़ती है ।

इसके हल्केपन और आग न पकड़ने के गुण के कारण इसे मौसम की जानकारी प्राप्त करने वाले गुब्बारों में प्रयोग किया जाता है । इसी कारण इसे सेना और नौसेना में भी इस्तेमाल किया जाता है । दमे के मरीजों को आसानी से सांस लेने के लिए हीलियम (Helium) दी जाती है । गोताखोर जब अपना काम समाप्त करके लौटते हैं , तब उन्हें सामान्य स्थिति में लाने के लिए हीलियम और ऑक्सीजन का मिश्रण दिया जाता है ।

इसे एल्यूमिनियम धातु को वेल्ड करने के काम में भी लाते हैं । हीलियम और नियान के मिश्रण से एक विशेष प्रकार की किरणें पैदा की जाती हैं , जिन्हें लेसर किरणें कहते हैं । हीलियम (Helium) गैस को -289 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान पर द्रव रूप में भी बदला जा सकता है । द्रव हीलियम का उपयोग अत्यन्त कम ताप पर किए जाने वाले कार्यों में होता है ।
      

इस गैस का पता सबसे पहले 1896 में अंग्रेज वैज्ञानिक जोसफनार्मन लॉकायर ( JosephNorman Lockyer ) और पियरे जैनसन ( Pierre Janssen ) ने अलग – अलग लगाया । सूर्य में उपस्थित तत्त्वों की जानकारी प्राप्त करने के लिए वे अपने स्पेक्ट्रोस्कोप द्वारा सूर्य के वर्णक्रम ( Spectrum ) का अध्ययन कर रहे थे । उन्हें इस वर्णक्रम में एक ऐसी रेखा ( Line ) मिली , जो पहले कभी नहीं देखी गई थी ।

यह रेखा किसी नए तत्व की उपस्थिति बताती थी । बाद में इस तत्व का नाम यूनानी शब्द हीलियोस ‘ ( Helios ) अर्थात ‘ सूर्य ‘ के नाम पर हीलियम रखा गया । बाद में वैज्ञानिकों ने यह भी पता लगा लिया कि हमारे वायुमंडल में भी हीलियम है , लेकिन इसकी मात्रा बहुत कम है । वायुमंडल में लगभग ढाई लाख घनफुट क्षेत्र में एक घनफुट हीलियम होती है ।
     अमेरिका के कुछ भाग जैसे टैक्सास , न्यू मैक्सिको , कंसास आदि ऐसे स्थान हैं , जहां पर वातावरण में हीलियम की मात्रा 8 % तक होती है । यह गैस कनाड़ा , अफ्रीका , और सहारा मरुस्थल में भी पाई जाती है । संसार में हीलियम अमेरिका में सबसे अधिक मात्रा में मिलती है । इसलिए अमेरिका ही अन्य देशों को सबसे अधिक हीलियम बेचता है । पहले यह गैस बहुत महंगी थी , लेकिन अब काफी सस्ती हो गई है ।

Ise Bhi Padhe – अमेरिका का नाम कैसे पड़ा ?

America Ka Naam Kaise Pada अमेरिका का नाम कैसे पड़ा ?

America Ka Naam Kaise Pada

अमेरिका (America) आज विश्व का सबसे समृद्ध तथा शक्तिशाली देश माना जाता है । मुख्य रूप से इसका विकास पिछले दो सौ वर्षों में ही हुआ है । इससे पहले यह 13 छोटी – छोटी बस्तियों में बंटा हुआ था । हम भलीभांति यह जानते हैं कि अमेरिका की खोज कोलंबस ( Columbus ) ने की थी , फिर इसका नाम उसके नाम पर क्यों नहीं पड़ा ? इसे कोलम्बस का दुर्भाग्य ही समझा जा सकता है । अमेरिका (America) का नाम अमेरिका कैसे पड़ा ? इसकी बड़ी दिलचस्प कहानी है ।

        इटली का विश्वविख्यात यात्री कोलंबस , जो स्पेन में नौकरी करता था , भारत की खोज करने समुद्री यात्रा पर निकला । 12 अक्टूबर 1492 की सुबह वह किसी द्वीप पर पहुंचा । स्पेन के राजा फर्डिनांड और रानी इजाबेला के नाम से उसने इस द्वीप पर अधिकार कर लिया और उसका नाम अमरिगा वसपुर सैन सल्वाडोर ( San Salvador ) रखा । यह द्वीप अमेरिका (America) का मुख्य भाग नहीं था , बल्कि एक छोटा – सा हिस्सा था । इसे आज वाटलिंग द्वीप ( Watling Island ) कहा जाता है । इस द्वीप को कोलंबस ने भारत ( India ) समझा और वहां के लोगों को भारतीय ( Indian ) कहना शुरू कर दिया । आज भी उन्हें इसी नाम से पुकारा जाता है । यहां से कोलंबस जापान जाना चाहता था , लेकिन वह क्यूबा और हिस्पेनिओला पहुंच गया । भारत को न खोज पाने से निराश होकर 13 मार्च 1493 को वह स्पेन वापस लौट गया । 

        14 सितंबर , 1493 की अपनी दूसरी यात्रा में उसने पोर्टेरिको व जमैका जैसे नए द्वीप खोज निकाले , लेकिन उसे भारत नहीं मिला । 1498 की तीसरी यात्रा में उसने ट्रिनिडाड को ढूंढ निकाला और वह दक्षिणी अमेरिका के मुहाने तक पहुंच गया ।

        उन्हीं दिनों स्पेन के अमेरिगो वेसपुच्ची ( Amerigo Vespucci ) नामक दूसरे नाविक ने यह घोषणा कर दी कि वह 16 जून 1497 को दक्षिणी अमेरिका की खोज करने वाला पहला व्यक्ति है । यद्यपि विशेषज्ञों का कहना है कि 1499 तक अमेरिगो ने कोई समुद्री यात्रा नहीं की थी । सन 1499 में अलॉन्सो द ओजेदा ( Alanso de ojeda ) ने फ्लारेंटाइन अमेरिगो वेसपुच्ची ( Florentine Amerigo Vespucci ) के साथ ओरिनोको ( Orinoco ) मुहाने तक यात्रा कर वेनेजुएला ( Venezuela ) की खोज की थी । 

        1501-02 में वेसपुच्ची ने पुर्तगाल के झंडे तले एक समुद्री यात्रा का मार्ग निर्देशन किया और ब्राजील की खोज की वेसपुच्ची यह जानता था कि कोलंबस ने जिस भूमिखंड को एशिया का एक भाग माना था , वास्तव में वह नयी दुनिया का एक महाद्वीप था । 

        1500 के आरंभ में वेसपुच्ची के लेखों का काफी प्रचार हुआ और उसको इस बात का यश प्राप्त हो गया कि वह पहला यूरोपीय व्यक्ति है , जिसने दक्षिणी अमेरिका को खोजा है । जर्मन के एक भूगोलशास्त्री मार्टिन बाल्ड सी मूलर ने अमेरिगो वेसपुच्ची को सम्मान देने के लिए ब्राजील के क्षेत्र को अमेरिका नाम दे दिया । तब से इस क्षेत्र का नाम अमेरिका पड़ गया ।

Ise Bhi Padhe – घड़ियों के मणिक क्या होते हैं ?

Kya Har Prakar Ke Adu Gatishil Hote Hai |क्या हर प्रकार के अणु गतिशील होते हैं ?

Kya Har Prakar Ke Adu Gatishil Hote Hai

प्रत्येक पदार्थ बहुत ही छोटे – छोटे कणों से मिलकर बना है , जिन्हें हम अणु (Adu) कहते हैं । अणु पदार्थ का वह छोटे से छोटा अंश है , जो स्वतंत्र अस्तित्त्व रखता है और उसमें पदार्थ के सभी गुण मौजूद होते हैं । उदाहरण के लिए यदि हम चीनी के एक अणु को लें , तो उसमें चीनी का स्वाद , रूप , रंग और अन्य सभी गुण होंगे ।

अलग – अलग पदार्थों के अणुओं के आकार अलग – अलग होते हैं । किसी पदार्थ का अणु इंच के अरबवें भाग के बराबर होता है , तो किसी पदार्थ का अणु (Adu) इससे हजारों गुना बड़ा होता है । बराबर । गैसों के अणु आकार में बहुत छोटे होते हैं । हवा के एक घन सेंटीमीटर में 25,000,000,000,000,000,000 अणु होते हैं ।

        यद्यपि पदार्थ के छोटे से टुकड़े में भी अणुओं की संख्या बहुत अधिक होती है , फिर भी अणुओं के बीच में रिक्त स्थान होता है , जिसमें पदार्थ के अणु (Adu) निरंतर गति करते रहते हैं । प्रत्येक पदार्थ यहां तक कि बर्फ के टुकड़े में भी अणु गति करते हैं । ऊष्मा और ऊर्जा के बढ़ने के साथ अणुओं की गति भी बढ़ती जाती है ।

पदार्थ का तापमान बढ़ने से उसके अणुओं की गति भी तेज होती जाती है । गैसों में रिक्त स्थान अधिक होने के कारण अणुओं की गति बहुत तेज  होती है , जबकि द्रवों और ठोस पदार्थों में स्थान कम होने से यह गति धीमी होती जाती है । प्रश्न यह है कि जब हर पदार्थ के अणु गतिशील रहते हैं , तब वस्तुएं हमें हिलती हुई महसूस क्यों नहीं होती ? 

      इसका कारण यह है कि पदार्थ में अणुओं के बीच एक आकर्षण बल होता है , जो उन्हें अपने स्थान पर रोके रखता है । यदि यह बल न हो , तब पदार्थ के अणु इधर उधर बिखर जाएंगे । यदि ठोस पदार्थ के अणुओं को ऊष्मा दी जाए , तब अणुओं की गति तेज हो जाती है और आकर्षण बल कम होने लगता है ।

परिणाम यह होता है कि ठोस वस्तु तरल अवस्था में आ जाती है । यदि हम ऊष्मा बढ़ाना जारी रखें , तो अणुओं की गति और भी तेज हो जाएगी और तरल पदार्थ तब गैसीय अवस्था में बदल जाएगा ।

Ise Bhi Padhe – घड़ियों के मणिक क्या होते हैं ?

Ghadiyo Ke Madik Kya Hote Hai घड़ियों के मणिक क्या होते हैं ?

Ghadiyo Ke Madik Kya Hote Hai

घड़ी खरीदते समय अक्सर लोग यह जरूर पूछते हैं कि इस घड़ी में कितने ज्वेल्स हैं । घड़ियों (Ghadiyo) पर प्रायः ज्वेल्स की संख्या लिखी भी होती है । लोगों का मानना है कि घड़ी में जितने अधिक ज्वेल्स होंगे , वह उतना ही सही समय बताने वाली और टिकाऊ होगी । आखिर ये ज्वेल्स होते क्या हैं और घड़ियों में क्यों लगाए जाते हैं , क्या तुम जानते हो ? आओ हम तुम्हें बताते हैं ।

         अच्छी घड़ी वही है , जो सही समय दे और जल्दी खराब न हो । यदि तुम किसी घड़ी (Ghadiyo) को खोल कर देखो , तब तुम देखोगे कि इसके अंदर का ढांचा बहुत पेचीदा है । इसमें बहुत से अलग – अलग तरह के छोटे – बड़े पुर्जे होते हैं । एक घड़ी में 211 पुर्जे होते हैं । इन पुों में एक छोटा सा पहिया होता है , जो लगातार गतिशील दिखाई देता है । इसके साथ ही एक बाल जैसा पतला तार होता है , जिसे कमानी कहते हैं ।

जब कमानी में हम चाबी देते हैं , तब घड़ी टिक् – टिक् की आवाज करने लगती है । वास्तव में चाबी देने पर कमानी में जमा ऊर्जा ही घड़ी को चलाती है । इस पहिए के अलावा और भी कई पहिए होते हैं , जो लगातार घूमते रहते हैं । यही पहिए घंटा , मिनट और सेकेंड की सुइयों को घुमाते हैं । इन पहियों की धुरियां चूलों पर टिकी रहती हैं । इनके घूमने से इन चूलों और धुरियों के बीच में रगड़ यानी घर्षण पैदा होता है ।

इस रगड़ से चूल और धुरियां जल्दी ही घिस सकती हैं और इस तरह घड़ी (Ghadiyo) की कार्यक्षमता जल्दी ही कम हो सकती है । इस घर्षण को कम करने के लिए चूलों के स्थान पर बहुत ही सख्त एवं चिकने पदार्थों के छोटे – छोटे टुकड़े लगाए जाते हैं । इन्हीं टुकड़ों को घड़ी का ज्वेल कहा जाता है । आमतौर पर ज्वेल रूबी यानी माणिक तथा नीलम जैसे कीमती पत्थर के बने होते हैं , जो हीरे से थोड़े ही कम सख्त होते हैं ।

ये बहुत चिकने तथा मजबूत होते हैं । इन ज्वेल्स पर टिके घड़ी के पुर्जे बहुत दिनों तक खराब नहीं होते और घर्षण ठीक रहने के कारण पहियों की गति में रुकावट नहीं आती । इसलिए घड़ी ठीक समय प्रदर्शित करती है । घड़ी में जितने अधिक ज्वेल्स लगे होंगे , वह उतना ही ठीक समय देगी और अधिक दिन चलेगी । इस प्रकार ज्वेल्स का प्रयोग घड़ी को अधिक समय तक सही समय बताने के लिए किया जाता है ।

Ise Bhi Padhe – क्या हर प्रकार के अणु गतिशील होते हैं ?

Chapati Sekane Par Phool Kyu Uthati Hai ? चपाती सेकने पर फूल क्यों उठती है ?

Chapati Sekane Par Phool Kyu Uthati Hai ?

तुमने अक्सर देखा होगा कि जब कभी तुम्हारी मां गैस स्टोव पर चपाती बनाती है , तब चपाती (Chapati) फूल जाती है । क्या तुम जानते हो कि ऐसा क्यों होता है ? आओ , हम तुम्हें इसका कारण समझाएं । 

        चपाती (Chapati) बनाने से पहले आटे में पानी मिला कर उसे गूंथा जाता है , फिर उसमें से लोई बनाई जाती है । इसी लोई से चपाती बनाते हैं । इसके बाद चपाती को तवे पर रख कर दोनों तरफ से सेंका जाता है । इस सिंकी हुई चपाती को सीधे गैस स्टोव की लौ पर रखते हैं ।

         आग की लौ पर रखा भाग गरम होने लगता है । यह  गर्मी चपाती (Chapati) में मिले पानी को भाप के रूप में बदलने लगती है । ऊपर का हिस्सा कम और नीचे का हिस्सा ज्यादा गर्म होता है , इसलिए वह दो भागों में विभाजित हो जाता है । साथ ही आग से जलने के कारण चपाती में कार्बन डाईऑक्साइड गैस बनने लगती है । चपाती के अंदर की यह गैस और भाप , अन्दरूनी दबाव के कारण ऊपर निकलने की कोशिश करती है , इससे चपाती फूल उठती है ।

         यदि चपाती में कोई छेद हो जाए , तब यह गैस उसमें से निकल जाती है और चपाती फूलती नहीं है । इसी प्रक्रिया से कड़ाही में तलते समय पूड़ियां भी फूलती हैं । 

Ise Bhi Padhe – क्रॉस क्या है और इसका जन्म कैसे हुआ ?