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Thursday, July 11, 2019

स्थानीय स्वशासन |local self government


स्थानीय स्वशासन |local self government

इस पोस्ट में आपको स्थानीय स्वशासन, स्थानीय स्वशासन की आवश्यकता क्यों हैं? पंचायती राज व्यवस्था बलवंत राय मेहता कमिटी इसके अलावा जी.वी.के राव समिति एल.एम सिंघवी समिति के मुख्य सिफारिशें  के साथ साथ विभिन्न सरकारों द्वारा पंचायती राज व्यवस्था लाने के लिए किए गए प्रयास जैसे कि राजीव गांधी सरकार के द्वारा, वी.पी सिंह सरकार के द्वारा नरसिम्हा राव सरकार के द्वारा इसके अलावा आप 73 वां संविधान संशोधन के बारे में संपूर्ण जानकारी हासिल कर सकते हैं।

स्थानीय स्वशासन का अर्थ है स्थानीय क्षेत्रीय सरकार यह व्यवस्था राज्य व्यवस्था और केंद्र व्यवस्था से आकार में बहुत छोटी होती है इसका संचालन स्थानीय लोगों के द्वारा होता है इसलिए इसे स्थानीय स्वशासन का नाम दिया गया है।
स्थानीय स्वशासन |local self government
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स्थानीय स्वशासन की आवश्यकता क्यों?

स्थानीय शासन विकेंद्रीकरण को मजबूत करता है क्योंकि यह स्थानीय लोगों द्वारा संचालित होता है इस कारण स्थानीय लोगों और उनकी इच्छा को बेहतर प्रतिनिधित्व देता है यह शासन जमीनी समस्याओं को अच्छी तरह जानता है और इन समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराता हैं।
स्थानीय स्वशासन के लाभ।
१-राजनीतिक लाभ - स्थानीय स्वशासन का डायरेक्ट डेमोक्रेसी यानी प्रत्यक्ष लोकतंत्र देखने को मिलता है इसमें  स्थानीय लोग सत्ता का संचालन करते हैं गांव नगर कस्बा आदि के लोग एक जगह इकट्ठे होकर सभा करते हैं अपनी समस्याओं का समाधान  करते हैं ।
२-सामाजिक लाभ-स्थानीय स्वशासन में समाज के विभिन्न वर्गों को शासन के साथ मिलकर काम करने का मौका मिलता है।इसके साथ स्थान

पंचायती राज|panchayati raj


पंचायती राज|panchayati raj
panchayti-raj

भारत में पंचायती राज शब्द का अर्थ ग्रामीण स्थानीय स्वशासन पद्धति से है इसे ग्रामीण विकास का दायित्व सौंपा गया है।
पंडित नेहरू की सरकार ने 1952 में सामुदायिक विकास कार्यक्रम तथा 1953 में राष्ट्रीय विकास योजना का आरंभ किया था इन योजनाओं की जांच तथा उनमें सुधार के लिए जनवरी 1957 में बलवंत राय मेहता की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया इस कमेटी ने नवंबर 1957 में अपनी रिपोर्ट पेश की तथा लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की सिफारिश की जो अंतिम रूप से पंचायत राज के नाम से जाना गया।

बलवंत राय मेहता कमिटी द्वारा की गई सुझाव व सिफारिशें।

१-तीन स्तरीय पंचायती राज की स्थापना-ग्राम स्तर ‌पर ग्राम पंचायत ब्लॉक स्तर पर पंचायत समिति तथा जिला स्तर पर  जिला परिषद की सिफारिश की तीनों 7स्तर आपस में अप्रत्यक्ष चुनाव द्वारा जुड़े हुए होने चाहिए।

२-ग्राम पंचायत की स्थापना प्रत्यक्ष रूप से चुने गए प्रतिनिधियों द्वारा होना चाहिए तथा जबकि ब्लॉक स्तर पर पंचायत समिति तथा जिला स्तर पर जिला परिषद का गठन अप्रत्यक्ष रूप से चुने प्रतिनिधियों द्वारा होना चाहिए ‌।
३-सभी योजना और विकास कार्य इन निकायों को सौंपा जाना चाहिए।

४-पंचायत समिति को कार्यकारी अधिकारी तथा जिला परिषद को सहकारी संबंध में कार्य तथा पर्यवेक्षण निकाय होना चाहिए।

५-जिला परिषद का अध्यक्ष जिला अधिकारी होना चाहिए।

६-लोकतांत्रिक निकायों में शक्ति वास्तविक तथा उत्तरदायित्व का वास्तविक स्थानांतरण होना चाहिए।

७-इन निकायों को पर्याप्त स्रोत मिलने चाहिए ताकि यह अपने कार्यों और जिम्मेदारियों को संपादित करने में समर्थ हो सके।

८-भविष्य में अधिकारों के और अधिक प्रत्ययन के लिए एक पद्धति विकसित की जानी चाहिए।
समिति द्वारा की गई सिफारिशों को राष्ट्रीय विकास परिषद ने जनवरी 1958 में स्वीकार किया परिषद ने किसी विशिष्ट प्रणाली पर जोड़ ना देते हुए इसे राज्यों पर छोड़ दिया राज्य अपने परिस्थितियों के अनुसार इस प्रणाली को विकसित कर सकती थी।

सर्वप्रथम एक्सपेरिमेंट के तौर पर आंध्र प्रदेश 1958 में अपनाया गया।

आधिकारिक तौर पर राजस्थान के नागौर जिले में सेकंड अक्टूबर पंचायती राज की स्थापना हुई उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने किया इसके बाद 1959 में आंध्र प्रदेश ने इसे लागू किया।
1960 के दशक में कई राज्यों ने पंचायती राज्य की स्थापना की राज्यों में इन संस्थाओं में स्तरों की संख्या, कार्यकाल ,संगठन कार्य और अन्य तरीकों में अंतर था राजस्थान में त्रिस्तरीय पद्धति अपनाई जबकि तमिलनाडु ने त्रिस्तरीय पद्धति अपनाई पश्चिम बंगाल में चार स्तरीय पद्धति अपनाई इसके अलावा राजस्थान आंध्र प्रदेश पद्धति में पंचायत समिति मजबूत थी क्योंकि नियोजन और विकास की इकाई ब्लॉक थी जबकि गुजरात और महाराष्ट्र में जिला परिषद मजबूत थी।

अशोक मेहता समिति

दिसंबर 1970 में जनता पार्टी की सरकार में अशोक मेहता की अध्यक्षता में पंचायती राज संस्थाओं पर एक समिति को गठित किया समिति ने अगस्त 1978 को रिपोर्ट पेश की समिति समिति ने 132 सिफारिशें की परंतु समिति का कार्यकाल पूरा होने से पूर्व जनता पार्टी सरकार गिर जाने के कारण केंद्र स्तर पर इस समिति की सिफारिशों पर कोई कार्यवाही नहीं की जा सकी राज्य स्तर पर कर्नाटक पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश ने अशोक मेहता समिति समिति के सुझाव को ध्यान में रखकर पंचायती राज संस्थाओं के पुनरुत्थान के लिए कुछ कदम उठाए।

अशोक मेहता समिति के मुख्य सिफारिशें

१-त्रिस्तरीय पंचायती राज पद्धति को दृय स्तर पद्धति में बदलना चाहिए ।जिला स्तर पर जिला परिषद तथा उसके नीचे मंडल पंचायत में 15000 से 20000 जनसंख्या वाले गांवों के समूह होने चाहिए।
२-पंचायती राज संस्थानों को संवैधानिक मान्यता दी जानी चाहिए।
३-उनकी जनसंख्या के आधार पर अनुसूचित जाति व जनजाति के लिए स्थान आरक्षित होना चाहिए।
४-पंचायती राज संस्थानों के मामलों की देखरेख के लिए राज्य मंत्री परिषद एक मंत्री की नियुक्ति होनी चाहिए।
५-विकास के कार्यों जिला परिषद को स्थानांतरित होने चाहिए और सभी विकास कार्य इसके नियंत्रण और देख रेख में होने चाहिए।
६-न्याय पंचायत को विकास पंचायत से अलग निकाय के रूप में रखा जाना चाहिए और एक योग्य न्यायाधीश द्वारा इसका सभापतित्व‌ किया जाना चाहिए।

जी.वी.के राव समिति

योजना आयोग ने 1985 में जी वीके राव की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया इस समिति का मुख्य कार्य ग्रामीण एवं गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम के लिए प्रशासनिक व्यवस्था तय करना था।
इस समिति ने रिपोर्ट में कहा कि विकास प्रक्रिया दफ्तर साही हो गई है नौकरशाही की इस प्रक्रिया के कारण पंचायती राज संस्थाएं कमजोर हो गई है। समिति ने पंचायती राज व्यवस्था को  बिना जड़ की घास कह संबोधित किया।
जी.वी.के राव समिति के मुख्य सुझाव और सिफारिशें

१-नियोजन और विकास की मुख्य ईकाई जिला को मानते हुए जिला परिषद को लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण में सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान दिया जाना चाहिए।

२-जिला एवं स्थानीय स्तर पर पंचायती राज संस्थाओं को विकास कार्यो के लिए नियोजन क्रियान्वयन एवं निगरानी में महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान की जानी चाहिए।

३-मजबूत विकेंद्रीकरण के लिए राज्य सरकार के कुछ नियोजन कार्यों को जिला स्तर पर हस्तांतरित किया जाना चाहिए।

४-एक जिला विकास आयुक्त के पद का सृजन किया जाना चाहिए इसे जिला सत्र के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में कार्य करना चाहिए था उसे जिला स्तर के सभी विकास विभाग का प्रभावी होना चाहिए।

५-पंचायती राज संस्थानों में नियमित निर्वाचन होने चाहिए।

एल.एम सिंघवी समिति

राजीव गांधी ने पंचायती राज संस्थानों के पुनरुत्थान के लिए 1986 में एल एम सिंघवी समिति का गठन किया।
एल.एम सिंघवी समिति की सिफारिशें
१-पंचायती राज संस्थानों को संवैधानिक रूप से मान्यता देने की आवश्यकता है इन निकायों की नियमित स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव कराने के संवैधानिक उपबंध की सलाह दी थी।

२-गांव समूह के लिए न्याय पंचायत की सिफारिश।

३-ग्राम पंचायतों को ज्यादा व्यवहार बनाने के लिए गांव का पूर्ण गठन किया जाए।

४-गांव की पंचायतों को ज्यादा आर्थिक संसाधन उपलब्ध कराने की जरूरत।

५-पंचायती राज संस्थानों के चुनाव उनके विघटन एवं उनके कार्यों से संबंधित जो भी विवाद उत्पन्न होते हैं उनके निवारण के लिए न्यायिक अधिकारियों की स्थापना की जानी चाहिए।

एल एम सिंघवी समिति द्वारा दिए गए सुझाव पर पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा देने के लिए कई सरकारों द्वारा महत्वपूर्ण  प्रयास किए गए।
-राजीव गांधी सरकार ने पंचायती राज संस्थानों के संवैधानिक करण और उन्हें ज्यादा शक्तिशाली और व्यापक बनाने हेतु जुलाई 1999 में 64 वा संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में पेश किया और अगस्त तक पारित किया गया परंतु जब यह विधेयक राज्यसभा में गया तो विपक्ष के जोरदार विरोध के कारण या विधेयक राज्यसभा में पास ना हो सका क्योंकि इस विधेयक में केंद्र को ज्यादा मजबूत बनाने के बात की गई थी जिस पर विपक्ष सहमत नहीं था। इस प्रकार यह प्रस्ताव असफल सिद्ध हुआ।
वीपी सिंह सरकार के द्वारा किया गया प्रयास-नवंबर 1998 में वी.पी सिंह की सरकार बनी और सरकार बनते ही उन्होंने फैसला किया कि स्थानीय स्वशासन को मजबूत करने का कार्य करेंगे ।इस काम को पूरा करने के लिए उन्होंने जून 1990 में पंचायती राज संस्थान के मजबूत करने के लिए सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों का 2 दिन का  सम्मेलन बुलाया जिस कि उन्होंने अध्यक्षता की इस सम्मेलन में संविधान संशोधन विधेयक को पेश करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई परिणाम स्वरूप सितंबर 1990 में लोकसभा में संविधान संशोधन विधेयक प्रस्तुत किया गया लेकिन वीपी सिंह की सरकार गिरने के साथ ही यह प्रयास असफल सिद्ध हुआ।
नरसिम्हा राव सरकार का प्रयास-वी.पी नरसिम्हा राव के नेतृत्व में  1991 में कांग्रेस की सरकार बनी एक बार फिर पंचायती राज व्यवस्था के संविधानिकरण के लिए बहस जोर हो गई । कांग्रेस ने विवादास्पद प्रावधानों को हटाकर नया प्रस्ताव रखा और सितंबर 1991 को लोकसभा में संविधान संशोधन विधायक प्रस्तुत किया गया। यह विधेयक लोकसभा के साथ राज्यसभा में भी पास कर लिया गया । अंततः यह 73वें संविधान संशोधन अधिनियम 1992 के रूप में पारित हुआ और 24 अप्रैल 1993 को प्रभाव में आया । यह संशोधन विकेंद्रीकरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण साबित हुआ संशोधन ने पंचायती राज को सशक्त कर मजबूर बनाया।

73 वां संविधान संशोधन|73rd constitutional amendment act

इस अधिनियम ने संविधान के 40वें अनुच्छेद को एक व्यवहारिक रूप दिया। 40वां अनुच्छेद राज्य के नीति निर्देशक तत्व के अधीन है जो राज्यों द्वारा पालन  किए जाने के बाध्य नहीं है 73वें संविधान संशोधन के बाद नई पंचायती राज पद्धति को अपनाने के लिए राज्य सरकार बाध्यकारी हो गई।
इस अधिनियम में भारत के संविधान में एक नया खंड 9 सम्मिलित किया इसे पंचायतें  नाम से उल्लेखित किया गया और अनुच्छेद 243 से 243 ण के प्रावधान  सम्मिलित किए गए इस अधिनियम में संविधान में एक नई अनुसूची भी जोड़ी इस में पंचायतों की 29 कार्यकारी विषय वस्तु है यह अनुच्छेद 243 G से संबंधित है ।

11वीं अनुसूची में शामिल कार्य

1- कृषि जिसमें कृषि विस्तर सम्मिलित है।

२-भूमि विकास भूमि सुधार लागू करना भूमि संगठन एवं भूमि संरक्षण

3-लघु सिंचाई जल प्रबंधन और नदियों के मध्य भूमि विकास

4-पशुपालन दूध व्यवसाय तथा मत्स्य पालन

5-मत्स्य उद्योग

6-वन्य जीवन तथा कृषि खेती

7-लघु वन उत्पत्ति

8-लघु उद्योग जिसमें खाद उद्योग सम्मिलित है

9-खादी ग्राम एवं कुटीर उद्योग

10-ग्रामीण विकास 

11-पीने वाला पानी 

12-इधन तथा पशु चारा

13-सड़के फोटो जल मार्ग तथा अन्य
 संचार के साधन
14ग्रामीण विद्युत जिसमें विधुत विभाजन समाहित है

15-गैर परंपरागत ऊर्जा स्रोत

16-गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम

17-प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा संबंधी विद्यालय

18-यांत्रिक प्रशिक्षण एवं व्यवसायिक शिक्षा

19-व्यस्क के  गैर व्यस्क का औपचारिक शिक्षा

20-पुस्तकालय

21-सांस्कृतिक कार्य

22-बाजार एवं मेले

23-स्वास्थ्य एवं स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं जिन्हें अस्पताल प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र दवाखाने शामिल है।

24-पारिवारिक समृद्धि

25-महिला एवं बाल विकास।

26-सामाजिक समृद्धि देश में विकलांगों को मानसिक रोगी की समृद्धि नहित है।

27-कमजोर वर्ग की समृद्धि जिसमें विशेषकर अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति वर्ग शामिल है

28-लोक विभाजन पद्धति

29-सार्वजनिक संपत्ति की देखरेख।

इस अधिनियम के बंधु प्रदेशों में बांटा जा सकता है।
अनिवार्य और स्वैच्छिक
अनिवार्य-अनिवार्य को पंचायती राज व्यवस्था के गठन के लिए राज्य के कानून में सामिल  किया जाना आवश्यक है ऐसे राज्य सरकार नजरअंदाज नहीं कर सकती हैं।
स्वैच्छिक-इन उपबंधों को राज्य अपनी आवश्यकतानुसार तथा विवेकानुसार सम्मिलित कर सकती हैं ।राज्य अपनी भौगोलिक राजनीतिक एवं प्रशासनिक तथ्यों को ध्यान में रखकर लागू करने का प्रावधान कर सकती है।
अनिवार्य प्रावधान
१-यह गांव या गांव के समूह में ग्राम सभा का गठन होना चाहिए

२-गांव गांव स्तर पर पंचायतों माध्यमिक स्तर एवं जिला स्तर पर पंचायतों की स्थापना।

३-तीनों सत्रों पर सभी सीटों के लिए प्रत्यक्ष चुनाव होने चाहिए

४-सभी शत्रु पर अनुसूचित जाति एवं जनजातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था किया जाना चाहिए

५-सभी स्तर पर सदस्य और प्रमुख दोनों के लिए एक तिहाई पद महिलाओं के लिए आरक्षित होने चाहिए।

६-पंचायतों के साथ ही मधु आती है वह जिला निकायों का कार्यकाल 5 वर्ष होना चाहिए तथा किसी पंचायत का कार्यकाल समाप्त होने के 6 माह की अवधि के भीतर नहीं चुनाव हो जाना चाहिए 

७-पंचायती राज संस्थानों में चुनाव कराने के लिए राज्य निर्वाचन आयोग की स्थापना होगी।

८-पंचायतों की वित्तीय स्थिति का समीक्षा करने के लिए प्रत्येक 5 वर्ष बाद एक राज्य वित्त आयोग की स्थापना की जानी चाहिए।

स्वैच्छिक प्रावधान
१-विधानसभा एवं संसदीय के निर्वाचन क्षेत्र विशेष के अंतर्गत आने वाली सभी पंचायती राज संस्थाओं में संसद और विधानमंडल दोनों सदन के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाना चाहिए।

२-पंचायत के किसी भी स्तर पर पिछड़े वर्ग के लिए सदस्य एवं प्रमुख दोनों के लिए स्थानों का आरक्षण हो सकता है।

३-पंचायतों को वित्तीय अधिकार देना मत हार तूने उचित कर बात कर सुलगा दी के आरोपण और संग्रहण के लिए प्राधिकृत करना।

४-पंचायती राज स्थानीय सरकार के रूप में काम कर सकें अथार्थ स्वायत्त निकाय बनाने के लिए उन्हें अधिकार और शक्तियां देना।

५-पंचायतों को सामाजिक न्याय व आर्थिक विकास के लिए योजनाएं तैयार करने के लिए शक्तियों और दायित्वों का प्रत्यायन और संविधान के ११वीं अनुसूची के 29 कार्यों में से सभी या कुछ  को संपन्न कराना।

73वा संविधान संशोधन अधिनियम के प्रमुख विशेषताएं|important features of 73rd constitutional amendment act

ग्राम सभा-यह अधिनियम पंचायती राज के ग्राम सभा के निर्माण की बात करता है । यह पंचायत क्षेत्र में पंजीकृत मतदाताओं की ग्राम स्तरीय सभा हैं।जो उन शक्तियों का प्रयोग करेगी और ऐसे कार्य कर सकेगी जो राज्य के विधान मंडल द्वारा निर्धारित किए गए हैं।

त्रिस्तरीय प्रणाली- इस अधिनियम में सभी राज्यों के लिए त्रिस्तरीय प्रणाली का प्रावधान किया गया है ग्राम स्तर पर ग्राम सभा ब्लॉक स्तर पर ग्राम समिति तथा जिला स्तर पर जिला परिषद के गठन की प्रावधान किया गया है। याद में पूरे देश में पंचायत राज्य की संरचना में समरूपता लाता है।

सदस्यों एवं अध्यक्ष का चुनाव-ग्राम  स्तर पर बच का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से ब्लॉक स्तर पर अध्यक्ष का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से इसी तरह जिला स्तर पर अध्यक्ष का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से होगा।
सीटों का आरक्षण-यह नियम प्रत्येक पंचायत में तीनों स्तरों पर अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति के लोगों को सदस्य और अध्यक्ष पद के लिए आरक्षण मुहैया कराता है और इस बात की भी व्यवस्था करता है कि तीनों स्तरों पर सदस्य और अध्यक्ष पदों के लिए महिलाओं की भागीदारी कम से कम एक तिहाई अवश्य होनी चाहिए इसके लिए आरक्षण भी सुनिश्चित की गई है।
पंचायतों का कार्यकाल- यह नियम सभी स्तरों पर पंचायतों का कार्यकाल 5 वर्ष के लिए निश्चित करता है समय पूरा होने से पूर्व से विघटित किया जा सकता है इसके बाद पंचायत  के लिए नए चुनाव होंगे इसकी 5 वर्ष की अवधि खत्म होने से पूर्व भी विघटित किया जा सकता है। और और विघटन के बाद छः महीने के भीतर चुनाव हो जाने चाहिए।  


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