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Monday, July 29, 2019

संसदीय शासन प्रणाली के अर्थ एवं विशेषताओं का विवेचना कीजिए/parliamentry system in india

संसदीय शासन प्रणाली के अर्थ एवं विशेषताओं का विवेचना कीजिए
Parliamentry system
Parliament

यह शासन की व्यवस्था है जिसके अंतर्गत व्यवस्थापिका और कार्यपालिका परस्पर संबंधित होती है और कार्यपालिका व्यवस्थापिका के  प्रति उत्तरदाई होती है|

गैटल लिखते हैं कि "संसदात्मक शासन,  शासन के स्वरूप को कहते हैं जिसमें प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद अपने कार्यों के लिए कानूनी दृष्टि से व्यवस्थापिका  के प्रति उत्तरदाई होती है क्योंकि आधुनिक राज्यों  के व्यवस्थापिका के दो सदन  होते हैं, और मंत्रिमंडल वास्तव में उस सदन के नियंत्रण में होता है जिसे वित्तीय मामलों पर अधिक शक्ति प्राप्त होती है और निर्वाचको  का भी अधिक सीधे ढंग से प्रतिनिधित्व करता है|" इस  शासन व्यवस्था को मंत्रिमंडलात्मक शासन के नाम से भी  पुकारा जाता है इसके अंतर्गत कार्यपालिका शक्ति किसी एक वयक्ति मे  निहित न होकर कैबिनेट नमक एक समिति मे निहित होती है | इसलिए इसे मंत्रिमंडल आत्मक शासन करते हैं इसके अतिरिक्त इस शासन व्यवस्था में कार्यपालिका व्यवस्थापिका होने के कारण इसे उत्तरदाई शासन के नाम से पुकारा जाता है|

संसदीय शासन की विशेषताएं


संसदीय शासन की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित कही जा सकती हैं
नाम मात्र की वह वास्तविक कार्यपालिका का भेद
इस शासन व्यवस्था में नाममात्र की वह वास्तविक कार्यपालिका मे भेद  होता है| राज्य  का प्रधान नाम मात्र की कार्यपालिका होती है, जबकि वास्तविक कार्यपालिका मंत्रिपरिषद होता है ना मात्र की कार्यपालिका इंग्लैंड के सम्राट या  भारत का राष्ट्रपति की तरह निर्वाचित  हो सकती हैं |वयवहार  में उनकी उन शक्तियों का प्रयोग  वास्तविक कार्यपालिका अथार्थ मंत्रिपरिषद दवारा ही किया जाता है |
कार्यपालिका के कार्य काल की अनिश्चितता
इस शासन  में कार्यपालिका अथार्थ  मंत्री  परिषद का कार्यकाल निश्चित नहीं होता है कार्यपालिका उसी समय तक अपने पद पर बने रह सकती है |जब तक कि उसे वयवस्थापिका का विश्वास प्राप्त रहता है |
मंत्रिमंडल की सामूहिक उत्तरदायित्व
संसदात्मक शासन व्यवस्था का एक अन्य सिद्धांत संसद के प्रति मंत्रिमंडल का सामूहिक उत्तरदायित्व है प्रशासनिक नीति निश्चित करने का कार्य मंत्रिमंडल द्वारा सामूहिक रूप से किया जाता है मंत्रिमंडल एक इकाई के रूप में कार्य करता है और सभी मंत्री एक दूसरे के निर्णय और कार्यों के लिए उत्तरदाई होते हैं यदि संसद का निम्न सदन किसी एक मंत्री के विरुद्ध अविश्वास का प्रस्ताव पारित कर दें अथवा उस विभाग से  संबंधित विधेयक को रद्द कर दे तो समस्त मंत्रिमंडल से त्यागपत्र देना पड़ता है|

व्यक्तिगत उत्तरदायित्व

प्रत्येक मंत्री अपने अधीन विभाग का प्रबंधक होता है अतः उसे व्यक्तिगत रूप से उस विभाग को सुयोग ढंग से चलाने के लिए विधानमंडल के प्रति उत्तरदाई रहना होता है|
प्रधानमंत्री का नेतृत्व
प्रधानमंत्री का नेतृत्व इस  पद्धति की अन्य महत्वपूर्ण विशेषताएं और सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत का पालन प्रधानमंत्री के नेतृत्व में ही किया जा सकता है प्रधानमंत्री मंत्रिमंडल का नेता होता है| मंत्रियों की नियुक्ति करता उनमें विभगों  का वितरण करता उनके कार्य में सामंजस्य स्थापित करता उनके विभागों का निरीक्षण करता और उन्हें  पद से हटा सकता है

संसदात्मक शासन के गुण


संसदात्मक शासन पद्धति के मुख्य प्रमुख गुण निम्नलिखित कहे  जा सकते हैं|

व्यवस्थापिका और कार्यपालिका में सहयोग


मानव शरीर के समान शासन व्यवस्था में भी एक  प्रकार की एकता होती है और श्रेष्ठ प्रशासन के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि प्रशासन के अलग-अलग अंगों में सहयोग हो, संसदात्मक  शासन व्यवस्था में ही इस प्रकार का सहयोग पाया जाता है |और इस सहयोग के परिणाम स्वरूप शासन कुशलता पूर्वक किया जा सकता है|
शासन व्यवस्था जनता के प्रति उत्तरदाई
संसदात्मक शासन में मंत्रिगण व्यवस्थापिका के सदस्य और इस रूप में जनता के प्रतिनिधि होते हैं| ये  मंत्री गण व्यवस्थापिका के माध्यम से जनता के प्रति उत्तरदाई भी  होते हैं |मंत्री लोगों को अपने पद पर बने रहने के लिए जनता के दृष्टिकोण का ध्यान रखकर उसके अनुसार कार्य करना होता है| इस प्रकार इस प्रशासन व्यवस्था का संचालन आवश्यक रूप से जनता के हित में होता है|

राजनीतिक शिक्षा


संसदात्मक शासन में अध्यक्षात्मक शासन की अपेक्षा जनता को राजनीतिक शिक्षा प्राप्त करने का अधिक अच्छा अवसर प्राप्त होता है |व्यवस्थापिका में विभिन्न विभागों के कार्यो की आलोचना होती है| जनता वयवस्थापिका के इस कार्य विवरण को रुचिपूवक पढ़ती है और सार्वजनिक समस्याओं के संबंध में ज्ञान प्राप्त करती है|

गत्यवरोध  की आशंका कम

अध्यक्षात्मक शासन शक्ति विभाजन के सिद्धांत पर आधारित होने के कारण उसने अनेक बार  एक दूसरे के कार्य में रुकावट डालने का प्रयत्न करते हैं :जिसके परिडाम  स्वरूप शासन में गति अवरोधक उपस्थित हो जाता है |किन्तु  संसदीय शासन व्यवस्थापिका  और कार्यपालिका बहुत अधिक श्रेष्ठ  रूप में परस्पर सहयोग  करती रहती हैं|और गत्वावरोध होने कि कोई आशंका नहीं रहती |

निरंकुशता का अभाव

संसदात्मक शासन में कार्यपालिका पर वयवस्थापिका  का पुड  नियंत्रण रहता है और यदि मंत्री लोग  मनमानी करें तो वयवस्थापिका  के द्वारा उन्हें पद से हटा दिया जाता है |इस स्थिति के कारण शासन कभी भी निरंकुश नहीं हो पाता है|

लोकतंत्रीय  सिद्धांत की रक्षा

लोकतांत्रिक सिद्धांतों की रक्षा बहुत अधिक सीमा तक संसदात्मक शासन व्यवस्था में ही संभव है| इसके अंतर्गत प्रशासकों का सदैव जनता के सामने अपने कार्यों का उत्तर देने के लिए तैयार रहना पड़ता है| इस प्रकार वास्तविक प्रभुसत्ता  जनता के पास ही रहती है|

संसदात्मक शासन के दोष


किस प्रकार के गुणों के साथ-साथ संसदात्मक शासन की कुछ दोष भी बताए जा सकते हैं जिनमें निम्नलिखित प्रमुख हैं|

दलीय  तानाशाही का भय

संसदात्मक शासन में राज्य शक्ति संपूर्ण  जनता के हाथों में न रहकार  एक दल विशेष के हाथों में रहती है व्यवस्थापिका के लोकप्रिय सदन में जिस राजनीतिक दल को बहुमत प्राप्त होता है उसके द्वारा कार्यपालिका का निर्माण किया जाता है इस प्रकार की इन दोनों विभागों की शक्ति आवश्यक रूप से एक ही राजनैतिक दल के हाथ में निहित  होती है इसके अतिरिक्त एक बार सत्ता आने हाथ में आ जाने पर वह राजनीतिक दल भ्रष्ट उपायों को अपना कर सकता अपने हाथ में रखने का प्रयत्न भी कर सकता है|

निर्बल शासन

संसदात्मक शासन में कोई एक ऐसा व्यक्ति नहीं होता जिसके हाथ में शासन की संपूर्ण शक्ति हो  और राज्य के सुशासन के लिए उत्तरदायी  हो,  शासन की यह  निर्बलता युद्ध अथवा अन्य संकटकालीन परिस्थितियों में असहनीय हो जाती है|

शक्ति पृथक्करण सिद्धांत का विरोध


शक्ति पृथक्करण लोकतंत्र का एक मुख्य सिद्धांत है और इस सिद्धांत के अनुसार शासन के अंतर्गत व्यवस्थापन शासन और न्याय संबंधी शक्तियां अलग-अलग हाथों में रहनी  चाहिए|

मंत्रिमंडलीय तानाशाही की प्रवृत्ति


वर्तमान समय में संसदात्मक शासन की यह प्रवृत्ति देखने में आई है कि संपूर्ण राजशक्ति मंत्रिपरिषद के हाथों में केंद्रित हो जाए और व्यवस्थापिका उसके हाथों की कठपुतली बन जाए| मंत्रिपरिषद की इस तानाशाही के परिणाम प्रजातंत्र के हित में अच्छे नहीं होते|

प्रशासन कार्य की अक्षमता


कार्यपालिका की व्यवस्थापिका से संबंधित होने के कारण मंत्रियों को बहुत समय व्यवस्थापिका में उपस्थित होने वहां वाद-विवाद सुनने और स्वयं वाद विवाद में भाग लेने में चला जाता है और यह मंत्रीगड  शासन संबंधी कार्यों को निभाने में ध्यान नहीं देते हैं|

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