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Wednesday, November 13, 2019

गांधी का राम राज्य की अवधारणा

                                       

            गांधी का  राम राज्य की अवधारणा

Gandhi ka ram rajya
Ram-rajya


                         दैहिक दैविक भौतिक तापा
                               राम राज नहि काहुहि व्यापा
                          सर नर करहि परस्पर प्रीति
                               चलहि सवधर्म विरत श्रुति नीत ||

तुलसीदास ने रामराज्य की बात कि जिसको आगे चलकर बीसवीं सदी में महात्मा गांधी ने बल दिया।  आखिर कैसा था राम का राज्य उस राज्य में किसी भी मनुष्य को दैहिक, दैविक, भौतिक समस्याओं से परेशान नहीं होना पड़ता, सभी मनुष्य प्रेम से रहते वे नीति और मर्यादा से तत्पर रहकर अपने अपने मनुष्योंचित  धर्म का पालन करते। 


महात्मा गांधी ने तत्कालीन समाज में व्याप्त गुलाम मानसिकता ,जातिगत भेदभाव ,संप्रदायिक दंगे, तथा गरीबों, किसानों, महिलाओं आदि के शोषण को देखकर इन सब दुखों का निवारण स्थान रामराज्य में देखा | गाँधी ने अपने राम राज्य जो  स्वतंत्र भारत में होगा की कल्पना करते हुए कहा था कि मैं ऐसे देश के लिए कोशिश करूंगा जिसमें गरीब लोग भी महसूस करने की यह  उनका देश है , जिसके निर्माण में उनकी आवाज का महत्व है। उनके भारत में ऊंचे ,नीचे वर्गों का विरोध नहीं होगा तथा विविध संप्रदायों का पूरा मेल जोल होगा। ऐसे भारत में अस्पृश्यता या शराब और दूसरी नशीली चीजों के अभिशाप के लिए कोई स्थान नहीं होगा। उसमें स्त्रियों को वही स्थान होगा जो पुरुषों का होगा तथा शेष सारी दुनिया के साथ हमारा संबंध शांति का होगा|

आज के समय में कुछ लोग रामराज  को हिंदू राज्य समझते हैं।  ऐसी समस्या केवल वर्तमान में नहीं है गांधीजी के सामने भी यही  समस्या थी लोगों के बीच अफवाह  उठ  रही थी कि गांधी जी हिंदू राज्य या  हिंदू  राष्ट्र बनाना चाहते हैं लेकिन ऐसा नहीं था  राज्य राज्य से उनका अर्थ हिंदू राज्य कदापि नहीं है बल्कि ईश्वरीय राज या  भगवान का राज है।  इस भगवान को चाहे कोई अल्लाह कहे  या गॉड   कहे  या वाहेगुरु इसमें कोई फर्क नहीं पड़ता।  इस राज्य में जहां सबसे कमजोर नागरिकों को भी बिना लंबी और महंगी  प्रक्रिया के राजा और रंक को बराबर का अधिकार हो। दरअसल महात्मा गांधी के राम   कबीर के राम की तरह थे  जिस तरह कबीर कहते हैं-

               ''  हिन्दू मूया राम कही मुस्लमान खुदाई,
                 कहे कबीर सो जीवत जे दुहूँ के निकट जाई ||''

उसी तरह गांधी के नजरिया में भी अनेक ईश्वर की इबादत करने वाली भी एक ही ईश्वर की आराधना करते हैं बस समझने का फेर है। महात्मा गाँधी सन्ति प्रिय देश बनाना चाहते थे। ऐसे समाया में जब लोग धर्म के नाम पर सड़को पे खून पानी की तरह बहा रहे हो उस समाया धर्म के प्रति गाँधी के विचारो को समझा जाना चाहिए। गाँधी जी के अनुसार धर्म सत्य और अहिंसा के पथ पर अडिग रहना ,पराये के पीर के प्रति असवेंदनशील होना ,नैतिकता और साधना शुचिता को अपनाना ,पशुबल का आत्मबल से सामना करना और अन्याय के आगे घुटने न टेकना। 


  गांधी जी ने संविधान की बात की , ऐसे राज्य बनाने का दिशा निर्देश दिया तथा सभी धर्मों के समन्वय  से अपने धर्म की परिभाषा दी।  जो सर्वशक्तिमान गुणों  से भरपूर होता है वह भगवान होता है ,उसके दिए  वचन हमारे लिए आदर्श बन जाते हैं जो आगे चलकर ग्रंथ का रूप लेता है। 

आज भारत स्वतंत्र है इस  भारसवतंत्र भारत में हमारे आदर्श या भगवान महात्मा गांधी है।  उनके विचार, आदर्श,तथा  संविधान हमारे धार्मिक ग्रन्थ  है। अगर  हम महात्मा  गांधी और उनके विचारों को इस रूप में मानते हुए चले तो सही मायने में विभिन्न समुदायों तथा जाति के बीच अनेकता में एकता को धरातल पर खड़ा कर पाएंगे। 

आज भारत आजाद है किंतु ऐसी अनेक समस्याएं हैं जिससे हम रामराज्य स्थापित करने में पीछे छूट गए हैं। आज भारत में हर स्तर पर भ्रष्टाचार भ्रष्टाचार व्याप्त है आज लोगों को अपने हक की प्राप्ति के लिए भी अपने ऊपर के कर्मचारियों को पैसे देने पड़ते हैं बिना डोनेशन बच्चों का विद्यालय तथा कालेजों में एडमिशन नहीं मिलता बिना मिलावट वाली सामान तो आप खरीद ही नहीं सकते।  आज जो नेता प्रतिनिधि बनते हैं वह भी सत्ता पा कर अपने कर्मों को भूल जाते हैं। 

गांधी ने अपने राम राज्य में महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार देने की बात की थी परंतु आज दहेज बलात्कार मानव तस्करी तथा उनको पुरुषों के बराबर कार्यालय में  आय  नहीं दिया जाता तथा बड़े पैमाने पर भ्रूण हत्या होती है।  आंकड़े बताते हैं कि देश भर में 75000 महिलाओं की मृत्यु प्रसव  के दौरान हो जाती है 28 पॉइंट 8% महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं। 

महात्मा गांधी ने शांतिप्रिय रामराज्य की कल्पना की थी जिसमें किसी प्रकार की हिंसा नहीं थी लेकिन आतंकवाद तथा नक्सलवाद ने शांति स्थापित करने में रुकावट पैदा की पठानकोट, पुलवामा, मुंबई आदि कई स्थलों पर ऐसी हिंसक घटनाएं देखने को मिली इन सब पर पूर्ण रूप से रोक लगाने के लिए सोचना होगा। 

गांधी के राम राज्य कि किसानों के बिना कोई कल्पना नहीं की जा सकती।  गांधी ने एक बार कहा था -

          ''अपनी मिट्टी और पृथ्वी को खोजने के तरीके को भूलना खुद के अस्तित्व को भूलना है। ''

आज भारत में किसानों को अपनी लागत के अनुरूप आमदनी नहीं हो पा रही है।  किसानों को फसल की पैदावार ज्यादा होने पर समस्या पैदावार ना होने पर समस्या होने लगी है।  उनका खेतों में नहरों से पानी पहुंचने की सुविधा ना होने के कारण सूखे के दिनों में किसान भुखमरी के शिकार हो जाते हैं। भुखमरी ,ऋण  जैसी समस्याओं के कारण देश में हजारों किसान आत्मदाह कर रहे हैं।  यह सोचने वाली बात है गांधी ने अंग्रेजी राज में किसानों की समस्याओं से निजात दिलाने के लिए बारदोली चंपारण,खेड़ा  आदि  आंदोलन किये।  आज हजारों किसान आत्मदाह कर रहे हैं।  गांधी ने अंग्रेजी राज में किसानों की समस्याओं से निजात दिलाने के लिए बारदोली चंपारण खेड़ा आदि आंदोलन किये  आज उनकी अपने सवतंत्र  देश में किसान आज भी उसी तरह की समस्या झेल रहे है। 

गांधी ने अपने राम राज्य में स्वराज की बात की उन्होंने गांव को महत्व दिया , आर्थिक तौर पर गांव को मजबूत करने पर बल दिया ताकि सब के बीच समानता लाई जा सके सब आत्मनिर्भर हों किंतु आज लोग आत्मनिर्भर नहीं हो रहे।  महंगाई चरम सीमा पर है। पेट्रोल डीजल के दाम आसमान छू रहे। और डॉलर के मुकाबले रुपया बहुत नीचे है। 'ऑक्सफैम' की रिपोर्ट के अनुसार भारत में ऊपरी 1 % लोगों के पास देश की 58% संपत्ति है

इतनी समस्याओं को देखकर प्रश्न यह उठता है कि आखिर हम रामराज्य कैसे बनाएंगे जिसका सपना स्वय महात्मा गांधी ने देखा था।  आज जो लोग इसे धर्म से जोड़कर देख रहे हैं चाहे वह हिंदू हो चाहे मुसलमान उन्हें  गांधी के रामराज के निहितार्थ  को समझना चाहिए। वरना हम उस गांधी के जिसने अपने निजी आकांक्षाओं  को पूरी तरह त्याग कर अपने आप को देश सेवा में लगा दिया।  उसके सपनों को पूरा नहीं कर पाएंगे। 

आज हमें बढ़ते हुए भ्रष्टाचार पर रोक लगाने, महिलाओं को पुरुषों के बराबरी पर लाने के लिए, किसानों को ऋण सिंचाई बीज न्यूनतम समर्थन मूल्य आदि को बढ़ावा देने के लिए हर संभव प्रयास करने की जरूरत है।  साथ ही साथ बढ़ते आतंकवाद तथा आर्थिक तौर पर समानता लाने का भी प्रयास करना चाहिए। 

इन सभी समस्याओं के उपरांत हम उस स्थान पर जरूर पहुंच जाएंगे जिसकी कल्पना गांधी और तुलसी कर रहे थे तथा मध्यकाल में उस काल की सारी कठिनाइयों से लड़कर कबीर जिस  समाज की कल्पना कर रहे थे।  यह तभी संभव है जब सभी धर्मों के लोग तथा सरकार नैतिक धरातल पर उन सपनों की प्राप्ति हेतु आगे बढ़ें। 


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