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Sunday, November 10, 2019

loh purush sardar vallabhbhai patel

                          लोह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल 

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तारिख 15 दिसम्बर, 1950 जगह मुम्बई समंदर का किनाराय एक चिता जल रही थी और उस चिता के सामने हजारों का हुजुम और उस हुजुम में शामिल देश के पहले राष्ट्रपति डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद और उस वक्त के कद्दावर नेता सी गोपालचारी दोनों की आँखे नम थी। डॉ0 प्रसाद ने उस जलती हुई चिता को देख कहा-

‘सरदार पटेल का शरीर अग्नी में विलिन हो रहा है
और ये आग चाहे जैसी भी हो सरदार की यश
और लोकप्रियता को खत्म नहीं कर सकती
आज हम अपने लिए शोक मना रहे हैं उनके लिए नहीं।’’

    उस चिता पे लेटे महान नायक जिसके मरने के गम से ज्यादा अपने लिए उसे खो देने का गम था उस सरदार पटेल का जन्म 31 अक्टूबर, 1875 को गुजरात के खेड़ा जिले के नाडियाड़ में उनके ननिहाल में हुआ। पिता झाबेर भाई पटेल और माता नाम लाडबा देवी था। सरदार पटेल अपने चार भाइयों और एक बहन के बीच चौथे नम्बर पर थे।
    कहा जाता है कि पूत के पाव पालने में ही दिख जाते हैं, तब शायद यह कोई नहीं जानता था कि सरदार पटेल आने वाले कल में आधुनिक भारत के निर्माता बनने वाले है। यह गुण उनके बाल्यावस्था में ही दिखने लगा था। पटेल के अंदर बचपन से ही दृढ़ता, निश्चितता तथा संगठन की ताकत के गुण दिखता था। सरदार पटेल जब विद्यालय में पढ़ते थे तब बच्चों को बुरी तरह पीटने वाले एक अध्यापक के खिलाफ सभी बच्चों को एकीकृत कर हड़ताल कर दी थी और उस अध्यापक को माफी मांगने पर मजबूर कर दिया था।

    सरदार पटेल की शिक्षा का प्रमुख श्रोत स्वाध्याय था। उन्होंने अपनी मैट्रिक की परीक्षा पास करने के उपरान्त गोदरा में वकालत की पढ़ाई की और 1902 में बोरसद में वकालत करने लगे। अब तक वो फौजदारी मुकदमों में वकालत करते हुए अच्छी खासी ख्याति प्राप्त कर चुके थे। 36 साल की उम्र की अवस्था में 1910 में बैरिस्टर की पढ़ाई करने के लिए लंदन गए और मिडिल टेम्पल में पढ़ाई करने लगे। पाँच साल की पढ़ाई 3 साल में प्रथम श्रेणी से खत्म कर भारत वापस आ गए।

    सन् 1913 में भारत लौटकर अहमदाबाद में वकालत शुरू कर दी। जल्द ही देश के नामचिन्ह ‘क्रिमिनल वकील’ बन गए। इन्हीं दिनों पटेल ने स्थानीय क्षेत्रों में शराब , छूआछूत और नारियों पर अत्याचार के खिलाफ लड़ाई लड़ी। यह वही दौर था जब एकीकृत हिन्दुस्तान का उम्मिद आग में तप कर लोहा बन रहा था। देश का यह भावी लौह पुरुष अपने शुरुआती दौर में देश के अन्य क्रान्तिकारियों से अलग ही अपने तेवर में अंग्रेजों से लोहा ले रहा था।
    सरदार पटेल वर्ष 1917 में सफाई कर्मचारी का चुनाव जीतकर स्थानीय निकाए के मूद्दों पर अंग्रेजों से लगातार बहस करते रहे। इसके बावजूद सक्रीय राजनीति या आजादी के लड़ाई में उन्होंने बहुत ज्यादा रूची नहीं दिखाई थी। सन् 1915 में महात्मा गांधी अफ्रीका में अहिंसा और सत्याग्रह का प्रयोग कर भारत लौटे थे और इसके दम पे अंग्रेजी सरकार को बाहर कर देना चाहते थे। कहा जाता है कि शुरुआती दिनों में पटेल महात्मा गांधी से प्रभावित नहीं थे। सत्याग्रह और अहिंसा के दम पे अंग्रेजों को बाहर कर देने का उनका सिद्धांत उन्हें असंभव प्रतीत होता था।
    अहमदाबाद में पटेल की मुलाकात जब महात्मा गांधी से हुई तो पटेल पुरी तरह बदल गए। यह वो दौर था जब वाणी से लेकर भेषभूषा तक सरदार बुरी तरह अंग्रेजी रंग में रंगे थे। पहनते थे तो सूट-टाई और बोलते थे तो अंग्रेजी। सूट-बूट के शौकीन पटेल ने पश्चिमी पोशाकों को उतार फेका और हमेशा के लिए खादी को अपना लिया। यह कोई मामूली त्याग नहीं था। बल्कि यह वह प्रण था जो अंग्रेजों को देश से बाहर निकाल कर ही खत्म होने वाला था। वह आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की गुजरात ईकाई में उन्हें सचीव चुना गया। वे महात्मा गांधी के स्वराज के प्रचार में जुट गए। अगले ही साल उनके अगुवाई में खेड़ा का एतिहासिक सत्याग्रह शुरु हुआ।

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    वर्ष 1917 का सावन गुजरात के किसानों के लिए मुसीबत बन कर आया इस साल बहुत ज्यादा बारीश हुई। लगातार बारीश से हालात बेकाबू होते चले गए। खेतों में बारिश का पानी जमा होने से किसानों की फसलें बर्बाद हो गई। खेड़ा जिले के आस-पास खाद्यान और पशुओं के चारे की भी भारी दिक्कत हो गई। इन्सान और जानवरों के लिए भूखमरी के हालात बन गए। ऐसे हालात में जब किसानों ने मालगुजारी न उसूले जाने की अनुरोध की तो अंग्रेजों ने किसानों के फरियाद सुनने से इंकार कर दिया।

    गांधी जी के आह्वान पर सरदार पटेल ने वकालत छोड़कर इस आन्दोलन में कूद पड़े। गाँव-गाँव जाकर किसानों को जागृत किया तथा किसानों को सरकारी अफसरों से न डरने का साहस जगाया। पटेल के व्यक्तित्व में जो अच्छे वक्ता, वकील तथा संगठन की जो ताकत थी उसका प्रयोग कर उन्होंने इस आन्दोलन को सफल बनाया। इस आंदोलन ने सरदार पटेल की जिन्दगी पूरी तरह बदल दी। सरदार अब बड़ा चेहरा बन गए थे। सरदार का अब लोगों के बीच में खड़ा हो जाना हि अंग्रेजों के बीच खलबली मच जाना था।

    इसी दौरान महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन की शुरुआत की तो सरदार पटेल इसे जी-जान से सफल बनाने में जुट गए। पटेल महात्मा गांधी के साथ सच्चे सिपाही की तरह हर पल हर कदम पर साथ निभा रहे थे। असहयोग आंदोलन के दौरान उ0प्र0 के चौरी-चौरा कांड के बाद महात्मा गांधी ने अपने अहिंसक आंदोलन को हिंसक होते देख इसे वापस लेने का फैसला किया तो कांग्रेस के भीतर कई नेताओं ने गांधी की आलोचना की लेकिन पटेल इस फैसले के पक्ष में चट्टान की तरह खड़े रहे।

    इस वक्त तक सरदार पटेल की छवी पूरे देश में महानायक की हो चुकी थी। गुजरात में तो इतना मसहूर थे कि चंद महिने में हि प्रदेश का दौरा कर कांग्रेस के लिए तीन लाख नए सदस्य बनाए और पन्द्रह लाख रूपए इकट्ठा कर दिए थे। सन् 1923 में जब महात्मा गांधी जेल में थे तो कांग्रेस ने उन्हें नागपुर आंदोलन की अगुवाई करने की जिम्मेदारी सौंपी। पटेल ने देश भर से हजारों लोगों को इकट्ठा कर नागपुर में राष्ट्रीय झंडा फहराया।
    सन् 1928 बारदोली में बाढ़ और अकाल से किसान भुखमरी के कगार पर थे। सरकार ने सालाना लगान में 30ः बढ़ाने का आदेश जारी किया हुआ था। बढ़ा लगान 30 जून 1927 से लागू था। इस बढ़े लगान को लेकर मुम्बई राज्य की विधानसभा में विरोध हुआ तथा किसानों का एक मण्डल उच्चाधिकारियों से भी मिला लेकिन उसका कोई असर नहीं हुआ था। जब सरकार टस से मस न हुई तो इसके विरोध में सत्याग्रह का फैसला किया गया। महात्मा गांधी की सलाह पर आन्दोलन की कमान सरदार वल्लभ भाई पटेल को सौंपी गई। जिसे उन्होंने अपना धर्म मानते हुए सहर्ष स्वीकार किया। और आंदोलन में जान लगा दी। सरदार ने किसानों से कहा कि आपको कुर्बानियां देनी पड़ सकती हैं, आपकी जमीन आपसे छिनी जा सकती है। पटेल से प्रभावित होकर किसानों ने सर्वसंमति से फैसला लिया कि किसी भी किमत पर बढ़ा हुआ लगान नहीं दिया जायेगा। अंग्रेजी सरकार ने लगान न देने पर किसानों के पशु धन और घरों की कुरकी कराने शुरू कर दी थी परंतु सरदार पटेल की कड़ी मेहनत और गांधी जी के अपील पर पुरे देश में बारदोली दिवस मनाया गया। सरकार को किसानों की बात सुननी पड़ी। वायसराय की सलाह पर मुम्बई की सरकार ने लगान के आदेश को रद्द कर दिया। और इस तरह फिर संघर्ष की जीत हुई।

    आन्दोलन की सफलता पर एक विशाल सभा का आयोजन किया गया। जिसमें बारदोली के किसानों ने पटेल को ‘सरदार’ की उपाधि से सम्मानित किया। उसी दौरान जब चारो तरफ सिर्फ पटेल के नारे लगने लगे तो पटेल ने अपनी उदारता का परिचय श्रेय न लेते हुए कहा,-
    ‘‘इस सत्याग्रह की सफलता के लिए आप मुझे श्रेय दे रहे हैं लेकिन मैं उसके पात्र नहीं हूं! जिस तरह कोई आसाध्य रोग से पीडि़त मरीज इंद्रलोक और परलोक के बीच में झूल रहा हो और कोई सन्याशी उसे जड़ी-बूटी दे जिससे वह रोगी स्वस्थ हो जाए ऐसी हालात हिन्दूस्तान के लोगों की है। अगर कोई सच्चा हकदार है तो वह सन्याशी है जिसने यह जड़ी-बूटी दी है। उसके बाद कोई हकदार है तो वह रोगी है जिसने वह दवाई ली, जिसने संयम रखा और बाकी के हकदार मेरे साथी हैं, जिनहोंने चकित कर देने वाले अनुशासन का परिचय दिया। मैं तो सिर्फ वह जड़ी-बूटी पीस कर खिलाने वाला हूँ।’’

    सरदार पटेल सच्चे मन से कार्य करते हुए आगे बढ़ रहे थे। मानो आजादी की प्राप्ती के प्रयास के अलावा और कोई काम ही न था। उन्होंने अपना जीवन पूर्ण रूप से स्वतंत्रता प्राप्ती के लिए लगा दिया था। वे अपने विचारों पर कायम थे। उनका विचार था कि जब तक हमारा अंतिम ध्येय प्राप्त न हो जाए तब तक हमें कष्ट सहने की शक्ति हमारे अंदर आती रहे यही हमारी सच्ची विजय है। उन्होंने इस विचार को जीवन के अंतिम समय तक कायम रखा।
    सन् 1930 में जब महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन चला रखा था। उसी दौरान पटेल और उनके साथियों को ज्यादा सक्रिय देख जेल भेज दिया गया था। उस दौरान जेल में उनके मित्र ने उनसे कहा कि हमारे गुजरात के आश्रमों पर अंग्रेज कब्जा कर रहे है तब सरदार पटेल चेहरे पर हल्की मुस्कान लेते हुए कहा क्यों न कब्जा करेगी हमने जो उसकी जेलों पे कब्जा किया हुआ है। ऐसी स्थिति में सिर्फ वही ऐसा शब्द बोल सकता है जिसके मन में कुछ खो देने का भय न हो सिर्फ और सिर्फ पाने की इच्छा हो और वो इच्छा आजादी थी।

    सन् 1930 में नमक सत्याग्रह के दौरान दांडी मार्च के लिए जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया पटेल भी उनमें से एक थे। सत्याग्रह के दौरान उनके ओजस्वी भाषाण के चलते हजारों लोग स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। तीस के दसक में वो कांग्रेस के बड़े नेता के रूप में उभरे। उन्हें गांधी के काफी नजदीक तथा कांग्रेस के ‘राइट विंग’ का लिडर माना जाने लगा था।
    सन् 1930 में गांधी डरविन समझौते के बाद पटेल जेल से बाहर निकले और उसी साल पटेल को कराची अधिवेशन में कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया। वह अधिवेशन कई मायनों में महत्वपूर्ण साबित हुआ पटेल के अध्यक्ष में इसी अधिवेशन में धर्म निरपेक्ष का ख्वाब देखा गया। इसके बाद अंग्रेजों के खिलाफ उनकी लड़ाई और तेज हो गई। पटेल ने लोगों को भरोसा दिलाया की जल्द ही देश को अंग्रेजों से मुक्ति मिलेगी और देश में यहाँ की जनता का शासन होगा।
    वर्ष 1942 में ‘भारत छोड़ों आंदोलन’ के दौरान पटेल की सक्रियता ओर बढ़ गयी। देश भर में घूम-घूम कर इस आंदोलन में जुड़ने की अपील करने लगे।
    अंग्रेजों के नजर में वे एक बार फिर चुभने लगे कुछ ही दिनों बाद उन्हें फिर से गिरफ्तार कर लिया गया। अहमदाबाद के किले में उन्हें बंदी बनाकर रखा गया। तीन साल बाद 1945 में कई कांग्रेसी नेताओं के साथ उन्हें रिहा किया गया। लेकिन तब तक अंग्रेजों की नींव हिल गयी थी। दूसरा विश्वयुद्ध खत्म हो चुका था और अंग्रेज पस्त थे और ऊपर से महात्मा गांधी जवाहर-लाल नेहरू तथा सरदार पटेल जैसे तेज तरार नेताओं ने अंग्रेजों की नीदे उड़ा दी थी। देश जाग चुका था लोग लड़ने को तैयार थे।

    सन् 1945 में विश्वयुद्ध समाप्त होने के पश्चात् ब्रिटेन में जो चुनाव हुए उसमें चर्चिल हार गया और भारत के स्वतंत्रता के समर्थक एटली ने विजय प्राप्त की। भारतीय लोगों में अब यह आशा जागृत हो चुकी थी कि भारत को स्वतंत्रता मिलने में अब समय नहीं लगेगा। परंतु इसी समय भारतीय नौसैनिकों ने मुंबई में अंग्रेजों के क्रूरता से परेशान होकर उनके विरूद्ध विद्रोह कर दिया। इस नाजुक समय में किसी भी तरह का विद्रोह अंग्रेजों को भारत में शायद कुछ दिन और ठहरने का मौका दे सकती थी। देश भर में हिंसा का ज्वार फैल सकता था।
    नौसैनिक उत्तेजित थे और शस्त्र त्याग करने के लिए तैयार नहीं थे। सरदार इस कठिन परिस्थिति में उत्तेजित नौसैनिकों से मिलने समंदर के बीच गए और उनकी बातें सुनी। उनकी सच्चाई को स्वीकार करने के पश्चात् भी उन्हें देश की परिस्थितियों एवं समय को ध्यान में रखने को कहकर उन्हें शस्त्र त्याग करवाया। इस विकट घड़ी में पटेल ने यदि बुद्धिमता का परिचय न दिया होता तो शायद भारत को स्वतंत्रता मिलने में कुछ और समय लग सकता था।

    15 अगस्त, 1947 को भारत आजाद हुआ परंतु यह स्वतंत्रता बिना सर्त नहीं मिली थी। देश को बंटवारे का जहर पिना पड़ा। 14 अगस्त 1947 को दुनिया के नक्से पर पाकिस्तान का जन्म हुआ। विभाजन के नियम अंग्रेजों ने तय किए। अंग्रेज प्रशासित राज्य दोनों देशों के बीच मजहबी (धार्मिक) आधार पर बांटे गए। बंटवारा सिर्फ जमीन पर नहीं हुआ था। आबादी भी धार्मिक आधार पर बंट रही थी। देश सांप्रदायिकता के आग में जल रहा था। उस समय असली मसला रियासतों का था। आजादी के समय देश में लगभग 565$ रियासतें थी ‘माउन्टबेटेन प्लान’ के तहत नवाबों और रजवाड़ों को दोनों देशों में किसी एक को चुनने का स्वतंत्र रहने का विकल्प दिया था।
    बतौर गृहमंत्री सरदार पटेल पर लोगों की सुरक्षा और देश को एक रखने की दोहरी जिम्मेदारी थी। पटेल ने भारत को आजादी मिलने से पहले ही जुलाई 1947 को रियासतों के प्रति आजाद भारत की सरकार की नीति को स्पष्ट करते हुए कहा था कि रियासतों को तीन विषयों सुरक्षा, विदेश और संचार व्यवस्था के आधार पर भारतीय संघ में शामिल किया जायेगा।

    सरदार पटेल ने राजाओं और नवाबों से देशभक्ती की भावना दिखाने का आह्वाहन किया। उनका मानना था कि देशी राजाओं को अलग राज्य बनाने का सपना असंभव है तथा भारतीय गणतंत्र का हिस्सा बनने में ही उनकी भलाई है। उन्होंने कहा देशी राजा भारत की आजादी से जुड़े और ऐसे जिम्मेदार शासक की तरह बर्ताव करे जो सिर्फ अपनी प्रजा के भविष्य की चिंता करते हैं। कई राजाओं ने सरदार पटेल की बात मानी और 15 अगस्त, से पहले ही विलय पत्र पर ‘दस्तखत’ कर दिए कुछ राजाओं ने थोड़ा आनाकानी की लेकिन कोई विकल्प न होने पर विलय की बात माननी पड़ी।

लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद जूनागढ़, भोपाल, हैदराबाद तथा कश्मीर भारतीय संघ का हिस्सा बनने को तैयार न थे। जूनागढ़ ने पाकिस्तान से मिलने की घोषड़ा की जबकी कश्मीर के राजा हरि सिंह ने अलग देश बने रहने का ऐलान किया।
जूनागढ़ पश्चिम भारत के सौराष्ट्र इलाके का एक बड़ा राज्य था। यहां के नवाब महावत खान की इस रियासत का बड़ा हिस्सा हिंदुओं का था। नवाब ने 14 अगस्त, 1947 को जूनागढ़ के पाकिस्तान में विलय का जब ऐलान कर दिया तब सरदार पटेल पाकिस्तान की चाल को भाप गए। सरदार पटेल ने इस रियासत के दो बड़े प्रांत मांगरोल और बाबरियाड़ा पर ब्रिगेडियर गुरदयाल सिंह के नेतृत्व में सेना भेजकर कब्जा कर लिया। नवाब ने काफी हाथ-पैर मारा पर वहां की जनता ने उसका साथ नहीं दिया। इसी बीच पटेल के रणनीति में गांधी जी के पोते समलदास गांधी की अगुवाई में बॉम्बे में जूनागढ़ की अंतरिम सरकार बनी। इस सरकार ने जनता के बीच जाकर भारत में विलय के आंदोलन को हवा दी।

इन सब के पीछे सरकार पटेल की कूटनीति ही काम कर रही थी। बढ़ते आंदोलन से घबराकर महावत खान पाकिस्तान भाग गया। नवंबर 1947 को भारतीय फौज ने जूनागढ़ पर कब्जा कर लिया। हालॉकि वी0पी0 मेनन और पटेल के इस फैसले से माउंटबेटन नाराज हो गए। पटेल ने आश्वस्त करने के लिए की जनता हमारे साथ आना चाहती है। पटेल ने वहां जनमत संग्रह कराया जिसमें 90 फिसदी से ज्यादा जनता ने भारत में विलय को स्वीकार किया।
जूनागढ़ की समस्या सुलझाने के बाद पटेल के सामने मुख्य समस्या हैदराबाद को लेकर थी। निजाम ने हैदराबाद को आजाद देश घोषित कर दिया था। पटेल ने निजाम से अपना फैसला बदलने को कहा। जून 1948 में माउन्टबैटन ने हैदराबाद को भारत से समझौता करने की सलाह दी। प्रस्ताव के तहत हैदराबाद भारत की प्रभुता की अधीन, एक स्वायत्त राज्य का दर्जा पा सकता था। लेकिन निजाम नहीं माना। निजाम के रजाकारों ने साम्प्रदायिक दंगे शुरू कर दिए तब पटेल ने हैदराबाद में सेना भेजने का फैसला लिया। 13 सितम्बर, 1948 को भारत और हैदराबाद के बीच लड़ाई शुरू हुई 18 सितम्बर को निजाम ने आत्मसमर्पण कर दिया।

जब देश के सभी नेताओं की नजर बड़ी रियासतों को जोड़ने पर ही लगा हुआ था। तब पटेल की सूक्ष्म दृष्टिकोण और भविष्य की आकांक्षाओं को ध्यान में रखे, उनकी नजर लक्ष्यदीप समूह में भी थी। इस क्षेत्र के लोग देश की मुख्यधारा से कटे हुए थे। उन्हें भारत की आजादी की जानकारी 15 अगस्त, 1947 के कई दिनों बाद मिली। हालांकि यह क्षेत्र पाकिस्तान के नजदीक नहीं था। लेकिन पटेल की राजनीतिक दृष्टि इस बात से भली-भाँति परिचित थी कि इस पर पाकिस्तान दावा कर सकता है। इसलिए ऐसी किसी भी स्थिति को टालने के लिए पटेल ने लक्ष्द्वीप में राष्ट्रीय ध्वज ‘तिरंगा’ फहराने के लिए भारतीय नौसेना का एक जहाज भेजा। इसके कुछ घंटे बाद ही पाकिस्तानी नौसेना के जहाज लक्ष्द्वीप के पास मंडराते देखे गए, लेकिन वहा भारत का झंडा लहराते देख उन्हें वापस लौटना पड़ा।
पटेल के सामने अब कश्मीर की समस्या थी। कश्मीर के राजा हरि सिंह किसी भी प्रकार से भारत में विलय करने को तैयार न थे वे स्वतंत्र रहना चाहते थे। इधर कश्मीर में पाकिस्तानी सेना के जवान और कबायली घुस आए। राजा हरि सिंह ने भारत से मदद मांगी। भारत ने अंतराष्ट्रीय कानूनों के तहत विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए बिना मदद से इन्कार कर दिया। आखिरकार 26 अक्टूबर, 1947 को महाराजा ने विलय के काजाद पर हस्ताक्षर कर दिए। तब पटेल के आदेशानुसार भारतीय सेना ने कश्मीर को पाकिस्तानी सेना तथा कबायलियों से आजाद कराया।
कश्मीर अब कुछ समझौते के तहत भारत का हिस्सा बन गया था। जिन्ना मुस्लिमों की जनसंख्या के आधार पर कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा बनाने की मांग करने लगे परंतु वह जनमत संग्रह कराने से भाग रहे थे। शायद कश्मीर में पाकिस्तानी सेना तथा कबायलीयों के द्वारा जो नरसंहार किया गया थाय उससे पाकिस्तान को डर था कि कश्मीर की जनता पाकिस्तान का पक्ष न ले। रामचन्द्र गुहा। अपनी किताब ‘भारत गांधी के बाद’ में लिखते हैं कि ‘‘जिन्ना को जूनागढ़ को लेने का कोई इरादा नहीं था वे नेहरू के साथ जूनागढ़ के बहाने कश्मीर की सौदेबाजी करना चाहते थे।’’ परंतु पटेल ने इस चालाकी को पहले ही भांप लिया था। पाकिस्तान ने जूनागढ़ में जो चालाकी दिखाई उससे पटेल कश्मीर को लेकर सख्त हुए। मुस्लिम नवाब के फैसले पर हिन्दू आबादी वाली रियासत को मिलाने के लिए पाकिस्तान राजी हो गया था। तो फिर कश्मीर में हिन्दू राजा के कहने पर मुस्लिम आबादी वाली राज्य को अपने क्षेत्र में मिलाने से भारत को क्यों ऐतराज हो पटेल का मानना था कि पाकिस्तान अपनी सहूलियत देखकर ‘पॉलिसी’ तय नहीं कर सकता।

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अंतरिम सरकार में गृहमंत्री के नाते कश्मीर से जोधपुर हैदराबाद से जूनागढ़ तक का दौरा किया तथा नवाबों और राजाओं को मना कर भारतीय संघ में जोड़कर आश्चर्यचकीत कार्य किया। अगर भारत के नक्से का कोई वास्तविक निर्माता है तो वह सरदार पटेल है। अगर सरदार पटेल ने यह कार्य न किया होता तो शायद भारत चार सौ या पाँच सौ देशों में बटा होता। पटेल द्वारा इस आश्चर्यचकित कार्य के लिए उनकी तुलना चांसलर विस्मार्क से की जाती है। जिसने 19वीं सदी के उत्तरार्ध में जर्मनी को एकीकृत किया था। लेकिन पटेल की उपलब्धि विस्मार्क से अधिक श्रेष्ठ थी। विस्मार्क ने जहां दस से पन्द्रह राज्यों को जोड़ने के लिए रक्तपात और दमन का सहारा लिया था, वहि पटेल ने पाँच सौ से ज्यादा रियासतें, 40 करो0 आबादी के अलावा करीब आठ लाख वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र को रक्त विहीन क्रांति से शामिल कर लिया।
पटेल के अंदर संगठन की एक अद्भूत प्रतिभा थी जिसको लेकर कोई भी आश्वस्त हो सकता था। गांधी ने पटेल को लेकर एक बार कहा कि-
‘‘राजाओं से निपटने का काम सचमूच बहुत कठीन था लेकिन मैं इस बात को लेकर आसवस्त था कि सरदार पटेल उससे निपटने में समर्थ थे।’

पटेल में त्याग की भावना भरी हुई थी, उनके अंदर किसी भी तरह का स्वार्थ नहीं था, दूसरों के लिए जो भी करते उसे अपना समझ कर करते। उनके लिए सब अपने थे। पटेल ने विदेश जाकर बैरिस्टरी करने के लिए पासपोर्ट बनवाया किन्तु अपने बड़े भाई बिट्ठल भाई पटेल की इच्छा जान अपना जाना स्थगित करके पासपोर्ट उनके नाम करा दिया। यह पटेल का अपने भाई के लिए त्याग था। लोगों के बीच यह प्रचलित है कि एक बार पटेल को कोर्ट में सुनवायी के दौरान एक पत्र के माध्यम से सूचना मिली की उनकी पत्नी इस दुनिया में नहीं रही। उन्होंने उस कागज को पढ़कर जेब में रखकर अपनी सुनवायी को जारी रखा और केस जीता। बाद में लोगों ने उनसे पूछा तो उन्होंने कहा कि यहाँ पर भी एक जीवन मृत्यु का प्रसंग चल रहा था। वह अब यह संसार छोड़ चुकी है यह मेरा धर्म था मैं उसे नहीं छोड़ पाया। उनका किया यह त्याग उनके कर्तव्य धर्म को दिखाता है। जिसके आगे वे नतमस्तक थे।
पटेल के लिए गांधी मार्गदर्शक थे। उनकी श्रद्धा गांधी के प्रति इस बात से लगाया जा सकता है कि पटेल ने गांधी को लेकर एक बार कहा-
‘‘मैने तो गांधी जी से कहा कि आप यदि आदेश दे कि मेरे पीछे-पीछे चलो तो मुझे उन पर इतनी श्रद्धा है कि मैं आँख बंद कर भागने लगूं।’
शायद यहि कारण है कि पटेल ने सन् 1929, 1936 तथा 1939 में कांग्रेस अध्यक्ष बनने की अपनी दावेदारी वापस ले ली। यहां तक कि सन् 1946 में जब आंतरिक सरकार में प्रधानमंत्री बनाने के लिए 15 प्रान्तीय कांग्रेस कमेटियों में से 12 ने सरदार पटेल के नाम का प्रस्ताव रखा परंतु गांधी जी की इच्छा का सम्मान करते हुए प्रधानमंत्री के पद का त्याग कर उपप्रधानमंत्री का पदभार सम्भाला।

कई इतिहासकारों तथा लोगों के बीच यह विवाद का विषय है कि गांधी और पटेल के बीच वैचारिक अनबन थी चाहे वह देश की विभाजन को लेकर हो, चाहे गांधी का विभाजन रोकने के लिए जिन्ना को प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव को लेकर हो, पटेल-जिन्ना के चालाकी को अच्छे से समझते थे। जहाँ उनको लगता गांधी, जिन्ना के चालाकी से अनभिज्ञ है वह उनका विरोध भी कर देते। इसमें कोई शक नहीं था कि पटेल गांधी को अपना आदर्श मानते तथा उनका सम्मान करते थे। किंतु देशहित उनके लिए पहले आ जाता था।

सन् 1946 में पटेल ने चुनाव की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी उठाते हुए चुनाव के लिए धन संचय आदि की सारी व्यवस्था की। जब गांधी जी ने इस प्रकार धनवानों से धन बटोर कर चुनाव जीतने के सरदार के कदमों के बारे में अप्रियता व्यक्त की तब सरदार ने गांधी जी के भावनाओं का सम्मान करते हुए कहा था कि-
‘‘यह कार्य उनका नहीं है, वे तो महात्मा हैं,
मैं नहीं हूं, मुझे तो यह कार्य पार लगाना ही है।’

इतिहास में पटेल और नेहरू के बीच भी कुछ लोगों द्वारा अनबन की बात की जाती है। पटेल ने अपने व्यक्तिगत महत्वकांक्षाओं को दरकिनार करते हुए देश को प्राथमिकता देते थे। नेहरू के भी जीवन काल में देश हित ही प्रमुखता से दिखता है। आजादी के बाद अवश्य नेहरू प्रधानमंत्री थे और पटेल गृहमंत्री, देश की तत्कालिक समस्याओं का समाधान दोनों को मिलकर करना था। अगर गांधी जी के शब्दों में कहं तो ‘‘अगर सरकार बैलगाड़ी है तो ‘जवाहर’ और ‘सरदार’ उसके दो बैल है।’’ पटेल नेहरू से काफी बड़े और मजबूत धरती पर लोट कर बड़े हुए थे। ऐ सभी गुण पटेल को ज्यादा अनुभवी बना देता था।

    पटेल और नेहरू के बीच का अंतराल दोनों के मध्य वैचारिक द्वन्द्व पैदा करता था। जिससे टकराहट होना स्वभाविक था। देश के आजादी के बाद जब दोनों को मंत्रालय में साथ काम करने का मौका मिला तो यह टकराहट ज्यादा दिखा। लेकिन पटेल इस टकराहट को किस नजरिए से देखते हैं ये ज्यादा महत्व रखता है- अंतरिम सरकार का मुखिया चुने जाने के बाद सरदार पटेल ने अपने करीबी कांग्रेस नेता डी.पी. मिश्रा को चिट्ठी लिखी उस चिट्ठी में उन्होंने कहा कि,-
‘नेहरू अक्सर मासूम बच्चे की तरह काम करते हैं,
उनकी तमाम मासूम गलतियों के बावजूद
उनके अंदर आजादी के लिए गजब का जज्बा
और उत्साह है, ऐसी उत्साह और जज्बा उन्हें
बेसब्र बना देता है। इसके चलते वे अपने
आप को भूल जाते है विरोधी होने पे
वे पागल हो जाते हैं क्योंकि वे उतावले हैं।’’
    स्पष्ट है कि पटेल ने कभी इसे व्यक्तिगत टकराव नहीं माना वे तो बस अपने अनुभव और आत्मविश्वास से परिस्थितियों को सुलझाने में लगे थे। 1950 में प्रकाशित ‘ऑल थ्रू द गांधियन इरा’ में ए.एस. आयंगर ने पटेल और नेहरू के काम करने के नजरिए को रेखांकित करते हुए लिखा कि-‘‘ये दोनों क्लीन फाइटर हैं, और नेहरू को जहां छक्के जड़ना पसंद है। वहीं पटेल एक शानदान बल्लेबाज हैं, जो गेंदबाजों को थकाकर अच्छा स्कोर खड़ा कर देते हैं।’’
    पटेल एक संस्कृति प्रेमी और धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति थे। पटेल ने गुजरात राज्य में स्थित सोमनाथ मंदिर का पुनः निर्माण कराया था। पटेल के एक मित्र ने जब उनसे पूछा कि आप इसी मंदिर का निर्माण क्यों कराना चाहते हैं, तो पटेल ने उत्तर देते हुए कहा कि-‘‘यह मंदिर न जाने कितने बार आक्रमण का शिकार हुआ फिर भी यहाँ खड़ा है और बचा हुआ है; यह इस बात का सबूत है कि संस्कृतियां मिटाने से नहीं मिटती।’’ इस मंदिर के निर्माण का उनका मुख्य ध्येय उस पहचान को कायम रखना था जो आने वाले पीड़ी को संकेत देती रहे की इतने ठोकरों के बावजूद यह खड़ा है तुम भी इससे प्रेरणा हासिल करो।

    पटेल के ऊपर देश के बंटवारे के समय अपने भाषण से धार्मिक टकराव पैदा करने के आरोप लगे लेकिन उसी समय जब कुछ कट्टरपंथियों द्वारा दिल्ली में स्थित निजामुद्दीन दरगाह पर हिंसा करने के षड़यंत्र का पता चला तो पटेल बिना देर किए बिना सुरक्षा के निजामुद्दीन गए लोगों को सुरक्षा दी तथा उनका विश्वास जीता। इसके अलावा भी कई पल थे जब पटेल ने अपने धर्मनिरपेक्षता का परिचय दिया था जो इस आरोप को पूरी तरह खारिज कर देता है।
    पटेल ‘सेकुलर’ होने के साथ राजनीतिक एकता और सांस्कृतिक विविधता के ‘फार्मूले’ में पूरी तरह से विश्वास करते थे। उन्होंने संविधान सभा में भी अपना योगदान दिया। देश के एकीकरण और आधुनिक भारत में निर्माण में सरदार पटेल के योगदान को हर भारतीय को याद करना चाहिए। सरदार होना आम बात नहीं है, जो व्यक्ति अपने पद से नहीं काम से प्रेम करता है वही सरदार पटेल बन पाता है।

    सरदार अपने संपूर्ण जीवन को लोगों की सेवा में लगा रखा, उनका सपना सिर्फ भारत को अंग्रेजों से निजात दिलाना हि नहीं था बल्कि सामाजिक बुराईयों से भी निजात दिलाना था। कुछ लोगों का मानना है कि उन्होंने गुजरात के जनजातीय लोगों को प्रोत्साहन देने को कार्य किया यही कारण है कि गुजरात में आज तक ‘नक्सलाइट’ की समस्या नहीं दिखी। उनका स्पष्ट मान्यता थी कि यदि सत्य के मार्ग पर चलना है तो बुरे आचरण का त्याग भी करना होगा। क्योंकि बिना चरित्र निर्माण के राष्ट्र निर्माण नहीं हो सकता।

    प्रश्न यह उठता है कि भारत को एकीकृत करने वाले सरदार को हम किस रूप में याद कर रहे हैं? देश के पहले प्रधानमंत्री नेहरू ने नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर बांध की नींव रखी जो वर्षों बाद आज बनकर तैयार है। इस बांध का पानी जब नहरों से होते हुए जिन लोगां की व्यास बुझाएगी, जिन किसानों की जमीन की उपज बढ़ाएगा तथा जब इससे निर्मित बिजली लोगों के घरों के अंधेरे को उजाले में बदल देगी तब-तब उन लोगों के दिलों में सरदार कायम रहेंगे।
    पटेल को 1991 में मरणोप्रांत देश का सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न दिया गया। वे सचमुच देश के सच्चे रत्न थे। आज सरदार के नाम पे अहमदाबाद में अंतराष्ट्रीय हवाई अड्डा है तथा सरदार के राष्ट्रीय निर्माण के आश्चर्यचकित कार्य को देखते हुए वर्तमान प्रधानमंत्री के प्रयासों से गुजरात राज्य में नर्मदा नदी के छोटे से टापू पर जिसे साधुबेट कहा जाता है- श्ज्ीम ैजंजनम वि नदपजलश् का निर्माण किया गया है। जिस प्रकार सरदार ने 565 से अधिक रियासतों को जोड़कर एक अखंड भारत का निर्माण किया। उसी प्रकार इस श्ैजंजनम वि न्दपजलश् को देश के एक लाख बासठ हजार गाँवों के किसानों से करीब एक सौ पैंतिस मैट्रिक टन लोहा जमा कर इस अखंड मूर्ति का निर्माण किया गया।

    यह पूर्ति हमारे अतुल्य भारत के सिर पर अनोखा ताज है। यह इस चित्र की निशानी है कि पटेल द्वारा निर्मित अखंड भारत हमेशा रहेगा कभी बंटेगा नहीं। ‘‘प्रधानमंत्री के शब्दों में यह भारत की 21वीं सदी का प्रतिरूप और इसके इतिहास की एक कविता है।’’ जिस प्रकार सरदार पटेल द्वारा पुनः निर्मित ‘सोमनाथ’ मंदिर देश की संस्कृति की साहस तथा सामर्थय को याद दिलाती रहेगी। उसी प्रकार यह मूर्ति पटेल की साहस, सामर्थय और संकल्प की याद दिलाती रहेगी।

    अज पटेल हमारे बीच नहीं है; उन्हें चाहकर भी भूलाया नहीं जा सकता, आखिर क्यों भूलाया जाए? क्या उनके बिना आजादी की कल्पना की जा सकती थी! उनके दिवसंगत होने पर ‘मानचेस्टर गार्डियन’ ने लिखा था, ‘‘पटेल के बिना गांधी के विचारों का वैवहारिक प्रभाव कम हुआ होता तथा नेहरू के आदर्शवाद के लिए कम गुंजाइस होती।’’ अगर इसे माने तो पटेल ने न सिर्फ अपने दृष्टिकोणों को धरातल पर उतारा बल्कि दूसरे के दृष्टिकोणों का सम्मान कर उसके भी धरातल पर लाने का कार्य किया।

    आज जरूरत है हमें पटेल के योगदान को हर वर्ष स्मरण करने की। यह प्रश्न उठ सकता है कि हर पल हृदय में राज करने वाले के लिए क्या आवश्यकता है हर वर्ष के एक दिन उनके नाम से मनाने की। लेकिन जिस प्रकार हम दसहरा में बुराई के प्रतीक रावण को जला कर अच्छाई के प्रतीक शीला गुण संपन्न भगवान राम को स्मरण कर हम आत्मा परमात्मा के रिस्ते को संस्कारित कर लेते हैं वैसे ही देश को एकता के सूत्र में बांधने वाले पटेल को भी हर वर्ष स्मरण करना उनसे हमारे रिस्ते को संस्कारित करने के समान है।

    हमारा देश विशाल है, पीढि़या बदलती रहती है तब यह आवश्यक महसूस होता है कि उन्हें देश को एकता के सूत्र में बांधने वाले सरदार पटेल के बारे में बताएँ उनके इस संदेश/अर्थ के साथ की एकता सिर्फ जमीन के टूकड़ों को जोड़ने में नहीं है, बल्कि भारत के विभिन्न संस्कृतियों, भाषाओं तथा विचारों को जोड़े रखने में है। तभी कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक कहलाएगा। और यह तभी संभव है जब हरपल एकता की रास्ते खोजते रहे, हर पल एकता को मजबूत करने के तरीके से जुड़ते रहे। वर्तमान में चल रहे श्त्नद थ्वत न्दपजलश् कार्यक्रम, देश भर में विभिन्न स्तर पर निबंध प्रतियोगिता, भाषण, वाद-विवाद आदि इस उद्देश्य की प्राप्ती के लिए सराहनीय कदम है।

    सरदार पटेल 1950 में 75 साल के हुए लेकिन तब तक ज्यादा तनाव की वजह से उनका शरीर जवाब देने लगा था। 15 दिसम्बर, 1950 को मुम्बई में उनका निधन हो गया। उनका परिवार पूरा देश उनके लिए आँसू बहा रहा था। डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद समुन्दर के किनारे अपने साथी के साथ बिताए यादगार पलों में खोए थे- उनका अक्खड़पन, उनकी निडरता, उनका साहस उनका सब कुछ आँखों के सामने था। वे आँसू-बहा रहे थे उनके लिए नहीं अपने लिए।

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