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Saturday, November 9, 2019

शीत युद्ध से क्या तात्पर्य है? तथा विश्व राजनीति पर इसके प्रभाव का विवेचना कीजिए।

शीत युद्ध से क्या तात्पर्य है? तथा विश्व राजनीति पर इसके प्रभाव का विवेचना कीजिए।


शीत युद्ध से तात्पर्य युद्ध का बहिष्कार या त्याग नहीं बल्कि दो महा शक्तियों (यूएसए एंड यूएसएसआर) के मध्य सीधे टकराव की अनुपस्थिति है। शीत युद्ध के तमाम वर्षों में तीसरी दुनिया में व्यापक घातक मुठभेड़ होती रही।
शीत युद्ध शब्द से सोवियत संघ -अमेरिकी शत्रुता पूर्ण तथा तनावपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संबंधों के अभिव्यक्ति  होती है। जो कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद विश्व राजनीति की वास्तविकता है इस शत्रुता पूर्ण संबंधों को गर्म युद्ध में परिवर्तित किए बिना इस शीत युद्ध में वैचारिक घृणा,राजनीतिक, अविश्वास, कूटनीतिक जोड़-तोड़, सैनिक प्रतिस्पर्धा, जासूसी और कटुता पुरुष संबंध देखे गए.।

शीत युद्ध की परिभाषा करते हुए जवाहरलाल नेहरू  ने कहा कि," यह एक ऐसा युद्ध है जो युद्ध क्षेत्र में नहीं बल्कि मनुष्य के मस्तिष्क में लड़ा जाता है और इसके द्वारा विचारों पर नियंत्रण प्राप्त किया जाता है.


शीत युद्ध शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम 16 अप्रैल 1947 को प्रणाम भरूच ने दक्षिण  कैरोलिन विधानमंडल में भाषण देते हुए किया। अनेक विद्वानों का मानना है कि शीत युद्ध के काल में 'राजनय  ने युद्ध की' और',' युद्ध ने राजनय की 'शक्ल ली अंतर्राष्ट्रीय मानचित्र पर अनेक देशों का महत्व सिर्फ उनकी भू राजनीतिक स्थिति के कारण घटा बड़ा तथा गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों की राजनैतिक भूमिका सदाशयी  मध्यस्थ के रूप में निरंतर बढ़ती गई।.

शीत युद्ध की प्रमुख विशेषताएं


शीत युद्ध एक ऐसी स्थिति है जिसे मूलत:उष्ण  शांति कहा जाना चाहिए ऐसी स्थिति में ना तो पूर्ण रूप से शांति रहती है और ना ही वास्तविक युद्ध होता है बल्कि शांति व युद्ध की बीच की अस्थिर स्थिति बनी रहती है.।हालांकि यह वास्तविक युद्ध नहीं होता किंतु यह स्थिति युद्ध की प्रथम सीढ़ी है जिसमें युद्ध के वातावरण का निर्माण होता रहता है या ऐसे ही स्थिति है जिसमें दोनों परस्पर शांति कालीन कूटनीतिक संबंध कायम रखते हुए भी परस्पर शत्रुता भाव रखते हैं और सशस्त्र  युद्ध को छोड़कर अन्य समस्त उपायों का सहारा लेकर एक दूसरे की स्थिति दुर्बल बनाने का प्रण करते हैं।
शीत युद्ध के संबंध में फ्लेमिंग  ने कहा है कि," शीतयुद्ध का उद्देश्य शत्रु को अलग-थलग रखना और मित्रों को जीतना होता है।"

विश्व राजनीति पर शीत युद्ध का प्रभाव 


विश्व राजनीति को  शीत युद्ध ने अत्यधिक प्रभावित किया इसमें विश्व में भय और आतंक के वातावरण को जन्म दिया जिसे शस्त्रों की होढ़  बढ़ी इसने संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी संस्था को पंगु बना दिया और विश्व को दो गुटों में विभक्त कर दिया। शीत युद्ध के प्रभाव में निम्न प्रकार है-

विश्व का दो गुटों में विभाजित हो ना


शीत युद्ध के कारण विश्व राजनीति का स्वरूप दृपक्षीय  बन गया संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ दो पृथक विचारों का प्रतिनिधित्व करने लगे अब विश्व की समस्याओं को इसी गुट बंदी के आधार पर आंका जाने लगा।  जिससे अंतरराष्ट्रीय समस्याएं उलझनपुण बन गई

भय  और संदेश  का वातावरण


महाशक्तियों की आपसी टकराव के कारण विश्व समुदाय के देशों में एक दूसरे के प्रति निरंतर भय एवं संदेश  का वातावरण बना।  इस प्रतिकूल वातावरण में  अंतरराष्ट्रीय समुदाय में सहयोग एवं विश्वास उत्पन्न करने में अनेक बाधाएं खड़ी की। 

आणविक युद्ध  की संभावना भय 


1945 में आणविक शस्त्र  का प्रयोग किया गया था। शीत युद्ध के वातावरण में यह महसूस किया जाने लगा कि अगला विश्व युद्ध  भयंकर आणविक युद्ध  होगा।  क्यूबा संकट के समय युद्ध  की संभावना बढ़ गई थी। 

निशस्त्रीकरण की असफलता


शीत युद्ध ने शास्त्रीकरण की होड़ को बढ़ावा दिया जिसके कारण विश्व शांति और  निशस्त्रीकरण की योजनाएं धूमिल हो गयी। 

सैनिक संघियो  व  सैनिक गठबंधन का बाहुल्य


शीत युद्ध ने विश्व में सैनिक संघ व सैनिक गठबंधन को जन्म दिया नाटो, सीएटो  सैांटो वारसा पैक्ट   जैसे सैनिक गठबंधन का प्रादुर्भाव शीत-युद्ध का परिमाण था।  इसके कारण शीत युद्ध में उग्रता आई उन्होंने निशस्त्रीकरण की समस्या को और अधिक जटिल बना दिया। 

संयुक्त  राष्ट्र संघ का अवमूल्यन


संयुक्त राष्ट्र संघ शीत युद्ध के काल में महा शक्तियों की राजनीति का अखाड़ा बनकर रह गया और इसे शीतयुद्ध के वातावरण में राजनीतिक प्रचार का साधन बना दिया गया। इस समय दोनों महा शक्तियों ने अपनी हठधर्मिता के कारण वीटो  का दुरुपयोग किया। 

मानवी कल्याण के कार्यक्रमों की उपेक्षा


शीत युद्ध के कारण विश्व राजनीति का केंद्रीय बिंदु सुरक्षा की समस्या तक ही सीमित रह गया  और मानव कल्याण से संबंधित कोई महत्वपूर्ण कार्यों का स्वरूप गौड़  हो गया।  शीत युद्ध के कारण ही तीसरी दुनिया के विकासशील देशों की भुखमरी ,बीमारी ,बेरोजगारी। अशिक्षा, आर्थिक पिछड़ापन, राजनीतिक अस्थिरता आदि अनेक महत्वपूर्ण समस्याओं के उचित निदान यथासंभव संभव नहीं हो सका क्योंकि महा शक्तियों का दृष्टिकोण मुख्यतः शक्ति की राजनीति शक्ति तक ही सिमित रहा। 

शीत युद्ध  का विश्व राजनीति पर सकारात्मक प्रभाव


1-शीत युद्ध के कारण गुट निरपेछ आंदोलन  को प्रोत्साहन मिला और तीसरी दुनिया के राष्ट्रों को उपनिवेशवाद से सही मायने में मुक्ति मिली।

2-शीत युद्ध के कारण शांति पुर्ण सहअस्तित्व को प्रसन्न मिला।

3-शीत युद्ध के कारण तकनीकी व प्रौद्योगिकी के विकास में तेजी आई। 

4-संयुक्त राष्ट्र संघ में निर्णय शक्ति  सुरक्षा परिषद के बजाय महासभा को हस्तांतरित हो गई। 

5-राष्ट्रों की विदेश नीति में यथार्थवाद का आविर्भाव  हुआ। 

6-शीत युद्ध से शक्ति संतुलन की स्थापना हुई। 

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