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Monday, December 2, 2019

रस संप्रदाय| भरतमुनि का रास सिद्धांत | रस सिद्धांत

रस संप्रदाय| भरतमुनि का रास सिद्धांत | रस सिद्धांत 


रस संप्रदाय के प्रवर्तक आचार्य भरतमुनि है इन्होंने ही रस का सबसे पहले निरूपण नाट्यशास्त्र में किया इसलिए उन्हें रस निरूपण का प्रथम व्याख्याता एवं उनके ग्रंथ नाट्यशास्त्र को रस निरूपण का प्रथम ग्रंथ माना जाता है.

यद्यपि भारतीय काव्यशास्त्र में रस सिद्धांत सबसे प्राचीन है परंतु इसे व्यापक प्रतिष्ठा बाद में मिली यही कारण है कि सबसे प्राचीन अलंकार सिद्धांत को माना जाता है इसकी प्राचीनता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि आचार्य भरत ने स्वयं रस को अर्थ वेद से लेने की बात की है नाट्यशास्त्र में इन्होने े लिखा है :-
" जग्राह पाठ्यमृग्वेदात्सामथ्यो गीतमेव च |
यजुर्वेहाद भिनयान रसानभर्तनादपि ||"
अथार्थ पंचमवेद में ऋग्वेद से पाठ, सामवेद से नृत्य और संगीत, यजुर्वेद से अभिनय और अथर्ववेद से रस तत्त्व लिया गया है |

राजशेखर ने अपने ग्रन्थ 'काव्य मीमांसा' को रूपक और नन्दिकेशव को रस का निरूपक आचार्य माना है तथा नन्दिकेशव की प्रमुखता को स्वीकार कर भरतमुनि ने भी नाट्यशास्त्र में इन्हे प्रमुख स्थान दिया | इसके बाद अगर किसी की प्रमुखता स्वीकारा है तो वह आचार्य दुरुहिन है. इन बिखरी हुई सामग्रियों का संकलन आचार्य भरत ने किया है.https://www.hindimesupport.in/search/label/premchand%20kahaniya
उनकी मान्यता है कि रस साहित्य का प्राण है रस रहित काव्य काव्य नहीं होता. उन्होंने स्पस्ट  कहा कि -
"नहि रसादृते कश्चिदर्थ प्रवर्तते" अथार्थ रस के बिना किसी अर्थ की सृष्टि नही होती तथा रस की निष्पति के सम्बन्ध में उन्होंने कहा कि -
"विभावनु भवत्यभिचारि संयोगाद्रास निष्पति. "
अर्थात विभाव, अनुभाव, और वैभिचारी  भावों के संयोग से रस की निष्पति होती है.

आचार्य भरत के पश्चात रस सिद्धांत के प्रमुख विवेचको के रूप में आचार्य भट लोल्लट, आचार्य संककु, आचार्य भट्नायक, आचार्य अभिनव गुप्त का नामोल्लेख है. जहाँ भट लोलट ने रस की मूल स्थिति मूल पत्रों में माना वहि शंककु ने नट में, भट्नायक ने दर्शक तथा अभिनवगुप्त ने सर्वांगीण वैज्ञानिक वैज्ञानिक व्याख्या किया है. उनके अनुसार स्थायीभाव सह्रदय या समाजिक के ह्रदय में वासना रूप में पहले से ही विधमान रहते है.

रस सिद्धांत की प्रमुख विवेचको  के अलावा नाट्यशास्त्र के ग्रन्थ  निरूपक आचार्य रामचंद्र-गुणचंद, धनिक,  धनंजय आदि ने गंभीर और व्यवस्थित विवेचन किया है तथा अपने ढंग से व्याख्या करने का प्रयास किया है |जैसे रामचंद्र गूढ़चंद  ने कहा -
"सुखदु : खत्मको रस :|" वही दण्डी के अनुसार "वामस्य ग्राम्यता येनि  माधुर्य दर्शतो रस :|" किसी प्रकार अन्य विवेचको  ने अपनी-अपनी व्याख्या प्रस्तुत की है.

परवर्ती  ग्रंथों में आचार्य रुद्रट कृत रस कर्णिका,  भानुदत्त कृत रसमंजरी आदि का उल्लेख किया जा सकता है. यह संपूर्ण ग्रन्थ ईशा  की चौथी शती से 17वीं शती तक लिखे गए हैं.
रस विवेचन रीति कालीन तथा आधुनिक कालीन आचार्यो ने भी करने का प्रयास किया है जिसमें सूर  कृत साहित्य लहरी, नंददास कृत रसमंजरी तथा  कृपाराम कृत हितरंगिणी,  केशव कृत रसिकप्रिया चिंतामणि कृत श्रृंगार मंजरी आदि ऐसे अनेक ग्रंथ है जिसमें रस सम्बंधित विवेचन किया गया है.
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आचार्य कृपा राम कृत हितरंगिणी को रीतिकाल का पहला सैद्धांतिक निरूपक ग्रंथ माना जाता है. रसिकप्रिया में नौ रसों की व्याख्या की गई तथा शृंगार रस को रसराजत्व की संज्ञा प्रदान की गई है. वहीं आचार्य चिंतामणि ने ममट एवं आचार्य विश्वनाथ की परंपरा का अनुसरण करते हुए श्रृंगार को लौकिक -अलौकिक भेद  किया. महाकवि देव की भोगविलास में रस विवेचन भानुदत्त और भोज से प्रभावित है. वे रस के लौकिक और अलौकिक भेद स्वीकार करते हैं. इस प्रकार अनेक रीतिकालीन आचार्यों ने अपने अपने मत  प्रस्तावित किए हैं.
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आधुनिक काल में महावीर प्रसाद द्विवेदी,  रामकुमार वर्मा, रामचंद्र शुक्ला आदि ने भी रासो  विस्तृत विवेचन किया. जहां महावीर प्रसाद द्विवेदी ने रस के महत्त्व को प्रतिपादित कर कविता का मुख्य गुण बताया तथा वहीं शुक्ला जी ने सर्वप्रथम शास्त्रीयता  से हटकर अपने प्रत्यक्षवादी दृष्टिकोण का प्रयोग कर रस का मनोवैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत की है. उनके अनुसार अलौकिक विषय है. उन्होंने कहा जिस प्रकार आत्मा की मुक्त अवस्था ज्ञान दशा का लाती है उसी प्रकार ह्रदय की  मुक्त अवस्था रस दसा कहलाती है.

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अंत में कहा जा सकता है कि जीस  संप्रदाय का प्रारंभ आचार्य भरत ने किया वह आगे चलकर भट्लोलट, शंकुक, भटनायक, अभिनव गुप्ता आदि रितिकालीन तथा आधुनिक आचार्यो  ने इसके महत्व का प्रतिपादन किया है तथा व्यवहारिक रूप देने का प्रयास किया जिसमें वह पुणत: सफल है|
https://www.hindimesupport.in/2019/07/nagmati-viyog-varnan.html

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