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Monday, April 27, 2020

अपभ्रंश भाषा का साहित्य


अपभ्रंश भाषा का साहित्य 


अपभ्रंश का आशय है 'गिरा हुआ'विगड़ा हुआ प्राकृत की तुलना में जिस भाषा में ध्वन्यात्मक तथा व्याकरणिक परिवर्तन हो गया था. विद्वानों ने उसे अपभ्रंश या अवहट्ट (अपभ्रष्ट) के नाम से सम्बोधित किया है। अपभ्रंश प्राकृत तथा आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं के मध्य की कडी है। कुछ थोड़े से लोग यह भी मानते  है की अपभ्रश प्राकृत एव आधुनिक भाषा की कड़ी नहीं है, अपितु वह भी प्राकृत युगान ही एक क्षेत्रीय भाषा है या प्राकृत है। लेकिन ऐसी संभावना है नहीं। अपभ्रंश प्राकृत एवं आधुनिक भाषाओं के मध्य कड़ी है, तथा प्रत्येक
भारतीय आर्यभाषा का प्रादुर्भाव किसी न किसी अपभ्रंश से हुआ है। भाषा के अर्थ में अपभ्रंश नाम का प्रयोग छठी शताब्दी में मिलने लगता है।
 मध्यकालीन भारतीय आर्य भाषाओं का अंतिम युग अपभ्रंश का है जो 500 अथवा 600
से 1000 अथवा 1100 ई० तक माना जाता है। जैसे संस्कृत के साहित्यिक रूप को व्याकरण
बद्ध कर देने पर जनभाषा ने प्राकृतों का रूप धारण कर लिया वैसे ही प्राकृतों का साहित्यिक भाषा के रूप में प्रयोग होने लगा और वह नियमों में अबद्ध कर दी गई तथा देशी बोलियों का नया विकास होने लगा जिससे विकसित रूप को हिन्दी भाषा साहित्य में अपभ्रंश के नाम से अभिहित किया गया है।
'अपभ्रंश' शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम पतंजलि (दूसरी शताब्दी ई० पू०) के महाभाष्य में मिलता है। प्रसंग के अनुसार पंतजलि ने अपभ्रंश शब्द का प्रयोग अपाणिनीय प्रयोग अथवा अशुद्ध प्रयोग के लिए किया है, किसी भाषा के नाम के रूप में नहीं। इस शब्द का इसी अर्थ में
प्रयोग दण्डी आदि प्राचीन आचार्यों ने भी किया है। आचार्य भरत ने नाट्यशास्त्र में उसे आभीर
या अहीरों की भाषा कहा और उसे उकारबहुला बताया है। भाषा के अर्थ में अपभ्रश का प्रयोग आचार्य भामह (7वीं शताब्दी) ने किया है और फिर कालिदास के 'विक्रमोवंशीय' नाटक के चतुर्थ अंक के श्लोकों में न केवल अपभ्रंश का प्रभाव है बल्कि छन्द भी अपभ्रश के ही है,प्राकृत के नहीं, इससे हम यह मान सकते हैं कि छठी-सातवीं शताब्दी से अपभ्रंश भाषा का
स्वरूप स्पष्ट रूप से निर्मित हो चुका था। आगे चलकर बारहवीं शताब्दी में हेमचन्द्र ने उसमें व्याकरण का रचना कर अपभ्रश तथा ग्राम्य भाषा में भेद दिखलाया है, जिससे आभास होता है कि उस समय तक अपभ्रंश को भी व्याकरण के नियमों में बाँध दिया गया था और परिणामस्वरूप नयी भाषाओं को जन्म मिला जिन्हें आ०भा० आर्य भाषाएं कहा गया। इस प्रकार अपभ्रंश युग का आरम्भिक छोर 600 ई० और अंतिम छोर 1100 ई० तक माना जा सकता है। यद्यपि इसके
बहुत पहले और बहुत बाद तक भी गौण रूप से अपभ्रश का प्रयोग लोकभाषा अथवा साहित्य में होता रहा।


प्राकृत और अपभ्रंश में इतनी समनता है कि कभी-कभी दोनों में अन्तर करना दुस्कर हो जाता है। रुद्रट के काव्यालंकार की टीका मे नमिसाधु ने प्राकृत को ही अपभ्रंश बतलाया है(प्राकृत एवापभ्रंशः)। हेमचन्द्र ने भी अपभ्रंश प्रकरण में कई दोहे शुद्ध प्राकृत के दिये हैं। किन्तु दोनों में कुछ स्पष्ट विभिन्नताएँ हैं। 
वे प्रधानतया परसर्गों, क्रियापर्दो तथा शब्द-भंडार सम्बन्धी है। अपभ्रंश में प्राय: 3 ही कारक समूह रह गये, कुछ नये कारक चिह्न भी विकसित हुए (ते, से,
पर)। तद्भव और देशज शब्दों का विस्तार बढ़ा।


अपभ्रंश के भेद-प्राचीन ग्रंथों में अपभ्रंश के भेदों का उल्लेख अनेक प्रकार से मिलता है।
किन्तु उसके तीन भेदों का उल्लेख अलंकार सूत्रों में प्राप्त होता है-नमिसाधु ने उपनागर,  आभाीर
और ग्राम्य तीन भेद अपभ्रंश के बतलाए हैं। हेमचन्द्र ने भी नागर, उपनागर और प्राचड़ तीन भेद बतलाए। नमिसाधु के उपनागर अपभ्रंश को ही मार्कण्डेय ने नागर माना है। यह स्टैंडर्ड अपभ्रंश थी। ब्राचड को मार्कण्डेय ने सिन्धु देश का माना है और उपनागर को नागर और ब्राचड का सम्मिलित रूप माना है। लेकिन इन भेदों से अपभ्रंश के मौलिक भेदों का ठीक-ठीक पता नहा
लगता। इसलिए कुछ विद्वान  यह मानते हैं कि प्रत्येक मध्ययुगीन भारतीय आर्यभाषा को अपभ्रंश की स्थिति पार करनी पड़ी है अर्थात् जितने प्रकार की प्राकृतें हैं उतनी ही अपभ्रंश भाषाएँ भी रहा होंगी। वस्तुतः उपर्युक्त तीन भाषाएँ केवल पश्चिमोत्तर प्रदेश की ही हैं। वस्तुत: प्राचीनकाल मे पश्चिमी अपभ्रश का ही महत्त्व अधिक था।। प्राकृत-काल की सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण भाषा
शौरसेनी से ही इसका विकास हुआ था। यह भाषा साहित्यिक दृष्टि से सारे उत्तरी भारत में प्रधान रूप से प्रयुक्त थी। यही कारण है कि प्राचीन वैयाकरणों ने इसी का प्रधानरूप से विवेचन किय है। वैसे स्थान भेद से पाँचाली, वैदर्भी, कैकेयी, गौड़ी आदि 27 अपभ्रंशों के नाम मार्रकण्डे बतलाया है।

डॉ०यकोबी ने अपभ्रंश के चार भेद माने हैं-उत्तरी, पश्चिमी. पूर्वी तथा दक्षिणी।
 दूसरी ओर डॉ तगारे ने  केवल तीन भेद, पूर्वी, पश्चिमी तथा दक्षिणी माना। उन्होंने दक्षिण अपभ्रंश के लिए 
पुष्पदंत कृत महापुराण', पश्चिमी के लिए 'भविस्सयत्त' कहा और पूर्वी अपभ्रश के लिए बौद्ध सिद्धो के दोहो को अपभ्रंश बतलाया। किन्तु इन सभी सामग्रियों का अध्ययन कर डा० नामवर सिंह ने अपभ्रंश के केवल दो भेद पश्चिमी और पूर्वी माने।उनके अनुसार इनमे  से  पश्चिमी अपभ्रंश स्टैन्डर्ड अपभ्रंश थी और पूर्वी उसकी विभाषा थी।

अपभ्रंश को पुरानी हिन्दी के नाम से सम्बंधित किया जाता है किन्तु प्रश्न यह उठता है की  फिर पाली , प्राकृत का भा क्यों न परानी हिन्दी कहा जाए और दूसरी बात यह कि जब आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं का विकास अपभ्रंश से ही हुआ तो फिर अकेले हिन्दाी  का ही अधिकार उस पर क्यों माना जाए।
अपभ्रंश की विशेषताएँ

(अ) ध्वनिगत विशेषताएँ-
(1)-अपभ्रंश में निम्नांकित स्वर थे: अ, आ, इ,ई,उ,
ऊ, ह्रस्व ए,  दीर्घ ए हस्व ओ, दीर्घ ओ। इसका अर्थ यह हआ कि उसमें ऐ, और आे नहाी  था।इन दसो  स्वरों के मौखिक तथा अनुनासिक दोनों रूप प्रयोग में थे। (डॉ० रवीन्द्र श्रीवास्तव)।

(2) ऋस्वरों में नहीं था। उसका कुछ क्षेत्रों में रि कुछ क्षेत्रों में तथा कुछ में 'र' उच्चारण
था। (डॉ० भोलानाथ तिवारी)। 
(3) व्यंजन थे: क,ख, ग, घ, ङ,च, छ, ज, झ,ञ,ट,ठ,
ड, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, प, फ, ब, भ, म, य, र, ल, व, स, ह। वैदिक संस्कृत में ळ का प्रयोग होता था। प्राकृतों में भी यह ध्वनि थी। अपभ्रंशों में इसकी स्थिति विवादास्पद है। आज मराठी, उड़िया आदि में तो यह है, अत: उन क्षेत्रों के अपभ्रंश में तो यह ध्वनि अवश्य थी, किन्तु
हिन्दी प्रदेश की अपभ्रंश में कदाचित यह व्यंजन नहीं था। हिन्दी में ड, ढ, व्यंजन भी हैं। संस्कृत, पालि, प्राकृत में ये नहीं थे। यह प्रश्न छोड़े विवाद का है कि अपभ्रंश में ये थे, अथवा नहीं। लोगों (जैसे डॉ. रवीन्द्र श्रीवास्तव) के अनुसार अपभ्रंश में या तो ये नहीं थे,या थे भी तो
ड, ढ से अलग इन्हें लिखने की पद्धति का विकास नहीं हुआ था। इसके विपरीत कुछ लोग (जैसे डॉ० भोलानाथ तिवारी) ऐसा मानते हैं कि अपभ्रंश में इनकी सत्ता नहीं थीं। न तो उच्चरण के स्तर पर न लेखन के स्तर पर। ऊपर की सूची में केवल 'स' दिया गया है, 'श' और 'ष' नहीं।
जैसा कि डॉ० नामवर सिंह (हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग) ने संकेत किया है, पूर्वी अपभ्रंश के केवल 'श' था किन्तु मानक अपभ्रंश में 'स' ही था। हिन्दी की पूर्वजा अपभ्रंश भाषा में भी यही विशेषता थी, इसीलिए उपर्युक्त सूची में केवल 'स' को रखा गया है।

(ब) व्याकरणगत विशेषताएँ-जहाँ तक अपभ्रंश की व्याकरणीय विशेषताओं का प्रश्न है-डॉ० नामवर सिंह ने कुल पंद्रह का उल्लेख किया है जिनमें प्रमुख ये हैं : (1) रूप-निर्माण की दष्टि से प्रतिपादकों की विविधता अपभ्रंश में नहीं रही, विभिन्न स्वरान्त के प्रतिपादक
अकरान्त पुल्लिंग शब्द के कारक रूपों से प्रभावित थे इस तरह रूपनिर्माण की दृष्टि से अपभ्रंश में केवल अकरान्त पल्लिंग प्रतिपादक की सत्ता थी। 
(2) व्याकरणिक लिंग-भेद क्रमश:
समाप्त हो चला था और नपंसक लिंग व्यवहारत: लगभग लुप्त हो गया था।
 (3) कारक विभक्ति  अपभ्रंश में आते-आते सिमट कर केवल तीन-समूहों में एकत्र हो गई थीं। पहला समूह प्रथमा, द्वितीया और सम्बोधन का; दूसरा तृतीया और सप्तमी का: तथा तीसरा चतुर्थी,पंचमी और षष्ठी का। 
(4) अधिकांशतः प्रथमा और द्वितीया में तथा कभी-कभी अन्य विभक्तियों में भी केवल निर्विभक्तिक शब्द का प्रयोग किया जाता था। 
(5) निविभक्तिक पदों तथा घिसे हुए सविभक्तिक रूपों से उत्पन्न अव्यवस्था और गड़बड़ी को दूर करने के लिए अपभ्रंश में अनेक स्वतन्त्र शब्दों का प्रयोग परसर्ग की तरह किया जाने लगा था: जैसे तृतीया के लिए 'सहँु , 'तण' चतुर्थी के लिए केहिं. रेसि; पंचमी के लिए होन्तउ, होन्त, थिङ; और षष्ठी के लिए केरअ, केर.कर, का, की और सप्तमी के लिए मज्झ, महँ आदि।
 (6) काल-रचना की दृष्टि से अपभ्रंश धातुओं के तिडन्त रूप मख्यतः लट लोट और लृट् लकाराम होते  थे ; शेष लकारों के रूप प्राय  कृदन्तज होने लगे। 
(7) अपभ्रंश में भूतकाल के क्रियापद तिङन्त नहीं थे। भूत काल की रूप रचना या तो-क्त आदि भूत कृदन्त के प्रत्ययों द्वारा होती थी। जैसे गय ढ गम  + क्त अथवा
भ. अस, कृ  आदि सहायक क्रियाओं के द्वारा संयुक्त काल के रूप में।
 (8) अपभ्रंश में संयक्त-क्रिया बनाने की प्रवृत्ति बहुत तेजी से चल पड़ी, जब कि प्राकत में नहीं के बराबर थी। जैसे-रडन्तउ जाइ, जाउँगठ, भग्गा एन्तु भज्जिउ जंति आदि।
 (9) पूर्वकालिक क्रिया के प्रत्ययों में अपभ्रंश ने प्राकृत के-इ।-एप्पि, -एप्पिणु,-एवि,-एविणु का प्रयोग करते हुए भी मुख्यत:-इ को ही अपनाया जैसे सुनि, चलि, करि आदि। 
(10) अन्य प्रत्ययों में स्वार्थिक प्रत्यय-ड के प्रयोग की बहुलता अपभ्रंश की निजी विशेषता है।
(स) शाब्दिक विशेषताएँ-जहाँ तक शाब्दिक विशेषताओं का प्रश्न है अपभ्रंशों में तत्सम शब्दों का प्रयोग कम हो गया तथा तद्भव का बहुत अधिक बढ़ गया। हाँ परवर्ती अपभ्रश में तत्सम शब्द अपेक्षाकृत कुछ बढ़ गए। साथ ही ऐसे शब्द भी काफी प्रयुक्त होने लगे जिनकी व्यत्पत्ति का पता नहीं था, अतः जिन्हें देशी या देशज कहा जाने लगा यद्यपि अधिकांश तद्भव हो था इस तरह के कुछ तथाकथित देशज शब्द अगलिखित है-
अच्ळरा अच्छरिज, उज्जउगरा, आक्खल, कुम्पल, गुड्डा, गहिर, घाव, घंट छावो झम्पडा रस्सी लोग, सहरी आदि। 
साथ ही परवता अपभ्रंश में कुछ अरबी-फारसी शब्द भी आ गए। जैसे सुलिताण, खुदा, दत्थरा (रुमाल), बोक्कडो (बकरा). कराली आदि। 
इसके आलावा द्रविड़ शब्द चिक्का(थोड़ा), पेट् (उदर ), पुल्ली(बाघ) आदि। हिंदी साहित्य के इतिहास में अपभ्रंश का बहुत महत्व है। 

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