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Wednesday, April 22, 2020

काव्य में बिम्ब विधान/बिम्ब का काव्य में महत्व

काव्य में बिम्ब-विधान/बिम्ब का काव्य में महत्व

छायावादी काव्य के शिल्प में कविता के अलंकरण के रूप में जिन उपकरणों का उपयोग होता रहा है। उन्हें बिम्बधर्मी कहते हैं। बिम्ब शब्द अंग्रेजी के (Image) शब्द का हिन्दी रूपान्तर है। बिम्ब का अभिप्राय किसी वस्तु को मूर्त रूप देने से है।

शार्टर ऑक्सफ़ोर्ड  डिक्शनरी के अनुसार- "एक पदार्थ  के लिए  ऐसे  मूर्त  या अमूत पदार्थ का प्रयोग जो उसके अत्यधिक समान हो अथवा उसे व्यंजित करता है।"

बिम्ब  इस प्रकार का शब्द चित्र होता है जिसमें भाव की अनिवार्यता होती है। अर्थात् उसे भाव चित्र की संज्ञा से अभिहित किया जा सकता है।

डॉ० नगेन्द्र ने बिम्ब को परिभाषित करते हए कहा है- "काव्य बिम्ब शब्दार्थ के माध्यम से कल्पना द्वारा निर्मित एक ऐसी मानस छवि है जिसके मूल में भाव की प्रेरणा रहती है।"

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि बिम्ब एक प्रकार का शब्द निर्मित एक ऐसी मानस  चित्र है जो प्रायः
विशेषण, रूपक, उपमा आदि पर आधारित होता है तथा कवि के तीव्र भावों वेग को पाठक तक सम्प्रेषित करता है।
बिम्ब शब्द का प्रयोग पाश्चात्य साहित्य के मुख्यतः तीन रूपों में हुआ करता है- 

1. मनोवैज्ञानिक
2. सौन्दर्यशास्त्रीय 
3. कलात्मक सौन्दर्य।

सी.डब्ल्यू. डे के अनुसार- ‘बिम्ब किसी पूर्ण बोध का मूल आलम्बन के अभाव में आंशिक अथवा समग्र रूप से पुर्नसृजन करने वाली सजग स्मृतियाँ हैं। स्मृतियों का सम्बन्ध अन्ततः कल्पना से है। स्मृति और कल्पना दोनों के संयोजन से बिम्बोत्पादन की प्रक्रिया चलती 
है। 
यह एक वास्तविक और अनुभूत सत्य है कि स्मृतियाँ ही व्यक्ति के मनोमस्तिष्क के अनेक प्रकार के प्राकृतिक बिम्बों की अमूर्त योजना रहती हैं। 
अतः मनोविश्लेषणशास्त्र की दृष्टि से बिम्ब स्मृति कल्पना की सस्मित सृष्टि है।
इस प्रकार बिम्ब निर्माण की स्थिति में कवि का वर्ण्य वस्तु से तदाकार होना नितान्त आवश्यक है तथा यह तादात्म्य तभी सम्भव है जब कवि में भावोत्प्रेरक कल्पना शक्ति की हो।

उपर्युक्त सभी विचारों का विश्लेषण करते हुए डॉ. नगेन्द्र कहते हैं-
1. बिम्ब पदार्थ नहीं वरनु उसकी प्रति छवि है। यह मूल सृष्टि नहीं पुर्नसृष्टि है।

2. बिम्ब एक ऐसा चित्र है जो किसी पदार्थ के साथ विभिन्न इन्द्रियों के सन्निकर्ष से प्रमाता के चित्र में उबुद्ध होता है।

3. अमूर्त बिम्ब नहीं होता जिन बिम्बों को अमूर्त बिम्ब मान लिया जाता है वे अचाक्षुष होते हैं अगोचर नहीं। 
निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि काव्य बिम्ब शब्दार्थ के
माध्यम से कल्पना द्वारा निर्मित एक ऐसी मानस छवि है जिसके मूल में भावों की प्रेरणा निहित होती है।

काव्य बिम्ब का कार्य या उद्देश्य-

काव्य बिम्ब का उद्देश्य सम्प्रेषणीयता है। काव्य बिम्ब का एक ऐसा मध्य सूत्र है जो विषय का प्रमाता से सम्बन्ध स्थापित करता है और स्वहृदय में कलात्मक अनुभूति को जागृत करता है। यह विषय को स्पर्शता प्रदान करता है।
भाव को समृद्ध बनाता है और कवि अनुभूति को तीव्रता प्रदान करता है, जिससे उसी प्रकार की अनुभूति सहृदय में जागृत हो सके।

बिम्ब के गुण एवं तत्त्व-
काव्य में घिसे-पिटे पुराने रूढ़ उपमानों या बिम्बों से कार्य नहीं चलता। पाठक नवीन प्रयोग और नये बिम्ब चाहता है। बदलता हुआ जीवन सन्दर्भ, नवीन शब्दता एवं नया विकास तथा आचरण की नवीन विकसित प्रणाली की इच्छा रखता है। सभी यह चाहते है कि कविता में नवीन विधानों का प्रयोग होता रहे, इसलिए कवि को भाव सामग्री से  उत्पन्न बिम्ब सष्टि के लिए नहीं रोकना चाहिए। क्योंकि कविजन सामान्य से अधिक भावुक
आर प्रबुद्ध नहीं होगा तो वह पुरातनता के आरोप का भागी बनेगा, जिसे सृष्टि क्षणमात्र के लिए स्वीकार नहीं करेगी।

"पुरातनता का यह निर्मोक,
सहन करती न प्रकृति पल एक।
नित्य नूतनता का आनन्द,
किये है परिवर्तन में टेक ।।"

नवीनता के लिए कवि की निरीक्षण शक्ति तीव्र होने के साथ-साथ हृदय भी संवेदनशा होना आवश्यक है इसके अतिरिक्त युगानुरूप नीवन बिम्बों का प्रयोग नितान्त आवश्यक है। 

विषयानुकूलता बिम्बों का अनिवार्य गुण है। जन सामान्य पर अभिस्ट  प्रभाव तभी पड़ेगा जब  विषय और बिम्ब दोनों में समरूपता होगी। बिम्ब योजना के  लिए बिम्ब और विषय अनिवार्य है। बिम्ब आदि के मन में धीरे-धीरे विषय को उद्घाटित करते चलें और विषय बिम्बों को नियंत्रण में रखे। बिम्ब के लिए ताजगी, सघनता तथा पाठक मे वैसे  ही अनुभूति जागृत करने की शक्ति (जैसी कवि की थी) भी आवश्यक मानी गई है।

ताजगी का अभिप्राय बिम्ब भाषा और शैली एवं नवान सामग्री द्वारा ऐसी मान उद्घाटन करे जिससे सहृदय पूर्व परिचित न रहे।
सघनता से अभिप्राय है कि कम से कम शब्दों द्वारा सघन अनुभूति को व्यक्त करना तथा बिम्बों की पूर्णता और सफलता के लिए कवि का भाषा पर जबर्दस्त अधिकार होना चाहिए।
वर्गीकरण- सगमता की दृष्टि से बिम्बों के विभिन्न रूपों को जान लेना आवश्यक है।बिम्ब कई प्रकार के होते हैं।

प्रथमतः अभिव्यंजना पर आधारित बिम्ब के अन्तर्गत दो प्रकार के बिम्ब आते हैं-
1.प्रत्यक्ष बिम्ब 
2. अलंकृत बिम्ब।
प्रत्यक्ष बिम्ब में कवि सामान्य पर अर्थ पूर्व शब्दों द्वारा ही चित्र खींच देता हैं जैसे-'माका बनगई आँधी भयावह।'

(साकेत की इस पंक्ति में कवि ने राजा दशरथ में शांतिपूर्ण हलचल तथा राज्य में
अस्थिरता प्रदान करने वाली कैकेयी की मूर्ति को आंधी शब्द से अंकित किया है।)

अलंकृत बिम्ब में रुपक, उत्प्रेक्षा एवं मानवीकरण अलंकारों द्वारा बिम्ब अंकित करता है।

ऐन्द्रिय बिम्ब-इन्द्रियों पर आश्रित बिम्ब पाँच प्रकार के होते हैं-
1. दृश्य बिम्ब- दृश्य बिम्ब के माध्यम से कवि सादृश्य बिम्ब उभरता है। सादृश्य विधायक अलंकारों में इसका स्वरूप देखा जा सकता है। जैसे-

"दिवसावसान का समय
मेघमय आसमान से उतर रही है,
वह संध्या सुन्दरी परी-सी
धीरे-धीरे-धीरे।"

2. श्रव्य बिम्ब-श्रव्य बिम्ब वे होते हैं जिनका आस्वादन श्रवणेन्द्रियों के माध्यम से किया जाता है।

'झूम-झ्म मृदु गरज गरज घनघोर,
राग अमर अम्बर में भर निज रोर।'


3. स्पृश्य बिम्ब- स्पृश्य बिम्ब विधान में स्पर्श जनित संवेदनाओं से बिम्ब निर्धारण होता है।
जैसे- 
'है स्पर्श मलय के झिलमिल सा।
संज्ञा को और सुलाता है।
पुलकित हो आंखे बन्द किये,
तन्द्रा को पास बुलाता है ।।'

4.घ्राण बिम्ब- घ्राण बिम्बों का निर्धारण बड़ा जटिल है। इसमें घ्राण जनित संवेदनाओं की अनुभूति की जाती है।

5. आस्वाघ बिम्ब- कवियों ने सौन्दर्य भाव की दो स्वादों के रूप में कल्पना की है-
माधुर्य और लावण्य।

"अतैव अस्वाध की अभिव्यक्ति सरल बिम्ब होता है-
जैसे- 
"माखन सो मन दूध सो जोवन है, दधिते अधिकै उरईठी।
जा छवि आगे छपाकर छाछ, समेव सुधा वसुधा सब सीठी।
नैनन नेह चुवै कवि देव बुझावति बैन वियोग अंगीठी।
मोमी रसीली अहीरी अहै, कहाँ क्या न लगे मनमोहन मीठी।।"

काव्य में बिम्ब का महत्त्व काव्य में बिम्ब का महत्त्व स्वतः सिद्ध है। बिम्ब के माध्यम से कवि का व्यक्तित्व दुखरित होता है। सौन्दर्य पक्ष का श्रेष्ठ प्रस्तुतीकरण भी इसी के द्वारा होता है. 




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