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Tuesday, April 28, 2020

Hindi Essay On Diwali : दीपावली पर निबंध हिंदी में

Hindi Essay on Diwali : दीपावली पर निबंध हिंदी में

दीपावली पर निबंध हिंदी में
Diwali

हिंदु धर्म के सभी पर्वो में दीवाली की महत्ता, व्यापकता और लोकप्रियता किसी भी पर्व को प्राप्त नहीं है।कार्तिक की अमावस्या के दिन मनाया जाने वाला यह पर्व असंख्य कंडीलों, मोमबत्तियों,रंगीन बल्बों, दीपमालाओं आदि से अमावस्या के गहन अंधकार को शरद् पूर्णिमा में परिवर्तित कर देता है। इनके प्रकाश के सम्मुख गगन के असंख्य तारे फीके पड़ जाते हैं।

दीपों के इस पर्व को किसी-न-किसी रूप में भारत के साथ -साथ दुनिया के लगभग सभी धर्मों के लोग मनाते हैं। इस पर्व के साथ अनेक पौराणिक भी जुड़ी हुई हैं। कहा जाता है कि धर्मराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ की समाप्ति इसी दिन हुई थी। कुछ लोगों का कहना है कि इसी दिन श्रीराम चौदह वर्ष के वनवास के बाद भाई और पत्नी सहित अयोध्या लौटे थे। उनके स्वागत में
अयोध्यावासियों ने अयोध्या नगरी को दीपों से  सजाया था। घर-घर मिठाईया बाँटे थे। तभी से परंपरा-रूप में यह पर्व आनंद, उल्लास और विजय का प्रतीक बन गया; क्योंकि इसकी पृष्ठभूमि में राम-विजय की पवित्र गाथा है। अत: यह पर्व श्रीराम के लोकरक्षक स्वरूप का स्मरण कराता हुआ हमें उन्हीं के समान आदर्श पति, आदर्श भाई और आदर्श मित्र बनने की
प्रेरणा देता है। पौराणिक कथाओं के आधार पर सागर-मंथन होने पर आज के दिन लक्ष्मी का आविर्भाव हुआ था। इस देवी की अर्चना करते हुए यह पर्व आर्थिक संपन्नता का प्रतीक बन गया है । व्यापारीगण इस दिन को अत्यंत पवित्र मानते हैं। अपने गत वर्ष का हिसाब-किताब साफ़ करके नए बही-खातों का आरंभ कर देते हैं। कई जगह लोग रात्रि-भर लक्ष्मी के आगमन और
स्वागत में घरों के दरवाजे  खुले रखते हैं। आज के युग में पौराणिक तत्त्वों के अतिरिक्त इस पर्व के साथ कुछ आधुनिक कारण भी जोड़ दिए गए है जो  इसके महत्त्व को बढ़ा रहे हैं। आर्यसमाज के प्रवर्तक स्वामी दयानंद सरस्वती का निर्वाण भी आज के ही दिन हुआ था। अत: इस मत के अनुयायी इस दिवस को बहुत पवित्र मानते हैं। इनके साथ ही जैनियों के चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी को भी इसी दिन निर्वाण प्राप्त हुआ था। अतः सारा जैन और आर्य  समाज इस उपलक्ष्य में इस पर्व को मनाता है। 

दीवाली का महत्त्व धार्मिक एवं सांस्कृतिक सीमाओं तक ही सीमित नहीं, अपितु इसका आर्थिक महत्त्व भी है। हमारा देश कृषिप्रधान है। हमारी बड़ा समाज  कृषि पर ही निर्भर हैं। इस पर्व से पूर्व पावस काल में स्थान-स्थान पर कीचड़ एवं गंदगी हो जाती है। इन दिनों साफ़-सफ़ाई करवाकर घरों में नए अनाज का भंडारण किया जाता है और गुड़ के रूप में मिठाई भी कृषकों के घरों में पहुँच जाती है। घरों व दुकानों में नए सिरे से लिपाई-पुताई कराई जाती है जिससे गंदगी और मच्छरों का
साम्राज्य समाप्त हो जाता है। मलेरिया आदि रोग फैलने से रुक जाते हैं। हर स्थान पर स्वच्छता दिखाई देती है। बाज़ार जगमगाने लगते हैं और सुगंधित पदार्थों से घर महक उठते हैं। एक नए उलास का आनन्द प्राप्त होता है। 

इस प्रकार से यह पर्व स्वच्छता और स्वास्थ्य का जनपर्व भी बन गया है। रात्रि के समय दीपमालाओं से सारा नगर जगमगा उठता है। मिठाइयों और खिलौनों की दुकानों पर अपार भीड दिखती है। इस पर्व पर लोग शुभकामनाओं के साथ अपने मित्रों और संबंधियों के पास मिठाई आदि भिजवाते हैं और आपसी मनमुटाव को भुलाकर जीवन को अधिक से अधिक प्रेममय बनाने का प्रयास किया जाता है।

दीवाली में इतने गुण होते हुए भी कुछ लोगों ने इसके साथ अवगुण भी जोड़ दिया है। इस दिन कछ लोग तास,  जुआ खेलते हैं। इनका विश्वास है कि इस दिन जीत होने पर वर्ष-भर तक लक्ष्मी देवी की कृपा  बनी रहेगी, पर होता इसके विपरीत ही है। इस कुप्रथा के कारण असंख्य
घर बरबाद हो जाते हैं और असंख्य व्यक्ति ऋण के भार से दब जाते हैं इस गलती की सजा पुरे परिवार को उठाना पड़ता है । चोरों ठगों का भी ऐसा विश्वास है। वे वर्ष-भर सफलता प्राप्त करने हेतु इस पर्व पर चोरी करना शभ समझते हैं। उन्हें कम-से-कम आज के दिन तो इस बुराई को छोड़ देना चाहिए और अन्य मार्ग अपनाने के लिए प्रयत्नशील होना चाहिए । दीवाली उल्लास, आर्थिक और प्रगतिसूचक पर्व है। राष्ट्र एवं जाति की समदधि का प्रतीक यह पर्व अत्यंत मनोरम व महत्त्वपूर्ण है। जुआ आदि कुप्रथाओं को छोडकर इसे पवित्र रूप से
मनाना चाहिए।हमें अपने जीवन में आये अंधकार को रौशनी से दूर कर देना चाहिए। 

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