🇧 🇪  🇨 🇦 🇷 🇪 🇫 🇺 🇱 🇱 🙏

कोरोना हारेगा हम जीतेंगे। घर में रहे सुरक्षित रहे ��

Monday, April 20, 2020

महात्मा गांधी पर आदर्श हिन्दी निबंध

Essay on mahatma gandhi in hindi
Mahatma-gandhi

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी /महात्मा गांधी पर आदर्श हिन्दी निबंध


राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम से भारत का बच्चा-बच्चा परिचित है। वे सत्य और अहिंसा के पुजारी थे। उनकी वाणी में जादू था जिससे सारा विश्व प्रभावित हुआ। हम भारतवासी इन्हीं के प्रताप से आज स्वतंत्रता की साँस ले रहे हैं। वास्तव में महात्मा गांधी जैसी महान विभूतियाँ
ही समय-समय पर विश्व में अवतरित होकर कष्टों से मुक्ति दिलाती हैं।

अंग्रेजों के शासनकाल में प्रथम स्वतंत्रता-संग्राम के बाद भारतीयों पर जो दमनचक्र चला, उसने हमें निस्तेज बनाकर बिलकुल पंगु -सा बना दिया था। सभ्यता और संस्कृति का ह्रास हो चुका था। ऐसे समय में मोहनदास कर्मचंद गांधी का गुजरात में पोरबंदर नामक स्थान में पुतलीबाई की कोख से 2 अक्तूबर, सन 1869 ई. को जन्म हुआ।

अभी ये युवा भी न हुए थे कि तेरह वर्ष की अल्पाय में ही पिता कर्मचंद गांधी ने कस्तूरबा के साथ इनका विवाह कर दिया। उन्नीस वर्ष की अवस्था में बैरिस्ट्री की शिक्षा के लिए जब ये विलायत जाने लगे तो माता पुतलीबाई ने मदिरा, मांस आदि का सेवन न करने का उपदेश दिया था। इन्होंने जीवन-भर माता के आदेश का पालन किया। ये सन 1891 ई. में बैरिस्ट्री पासकरके भारत लौटे।

इन्होंने मुंबई में वकालत आरंभ की जिसमें इन्हें अधिक सफलता नहीं मिली। सफलता न मिलने का कारण यह था कि मुकदमे झूठे आते थे और ये झूठे मुकदमों से दूर रहना चाहते थे। उन्हीं दिनों इन्हें किसी व्यापारिक संस्था के मुकदमे की पैरवी करने के लिए दक्षिण अफ्रीका
जाना पड़ा। वह मुकदमा तो गांधीजी ने जीत लिया पर इसके साथ ही इनकी जीवनदिशा भी मुड़ गई। अफ्रीका में कालों के प्रति गोरों का व्यवहार शोचनीय  एवं असंतोषजनक था। गांधीजी ने ऐसे दर्व्यवहार के प्रति आवाज उठाई। उनमें आत्मविश्वास की भावना जागी, उनका दष्टिकोण असांप्रदायिक हो गया और वे रंगभेद की परिभाषा को मानने से इनकार करने लगे। वहीं रहकर सन 1894 ई. में इन्होंने नेशनल इंडियन कांग्रेस की स्थापना की। अफ्रीका में 8 वर्ष तक सत्याग्रह
आंदोलन चलता रहा जिसका अंत सन 1914 ई. में हुआ।

गांधीजी जब भारत लौटे तब प्रथम विश्वयुद्ध छिड़ चुका था। इसमें भारत द्वारा अंग्रेज़ों की धन-जन से सहायता की गई पर उन्होंने स्वराज्य का वचन देकर भी अँगूठा दिखा दिया। गांधीजी ने साहस नहीं छोड़ा। ये स्वराज्य प्राप्त करने की राह पर चलते रहे। सन 1920 और 1930 में इनके द्वारा चलाए आंदोलनों से अंग्रेज़ काँप उठे।

भारत में भी छुआछूत की अमानवीय प्रथा देखकर
गांधीजी का चित्त अत्यंत व्याकुल हुआ। इसको मिटाने के लिए भी इन्हें आंदोलन चलाना पड़ा जिसमें सफलता ने इनके पग चूमे। बहुत से मंदिरों में अछूतों का प्रवेश प्रारंभ हो गया। फिर ये ग्रामों के सुधार में लगे। साथ ही इन्होंने नारी शिक्षा योजना का श्रीगणेश किया।

सितंबर, 1939 ई. में जर्मन और अंग्रेजों का युद्ध छिड़ गया जिसमें भारतीयों की सहमति लिए बिना ही भारतीय सेना ब्रिटेन की रक्षा के लिए भेज दी गई। इससे राष्ट्रीय नेताओं में रोष उत्पन्न हुआ और उन्होंने असेंबली हाउस त्याग दिया। 16 अक्तूबर, सन 1940 ई. को पुनः
आंदोलन चलाना पड़ा। राष्ट्रीय नेताओं को बंदी बना लिया गया। सन 1942 में राष्ट्रीय स्तर पर क्रांति हुई जिसमें लाखों भारतीयों ने बलिदान दिया। फिर भी गांधीजी का स्वतंत्रता संग्राम चलता रहा। तभी नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने भारत से बाहर 'आजाद हिंद सेना' बनाकर अंग्रेज़ों के छक्के छुड़ा दिए। इससे अंग्रेजों के पैर डगमगा गए। जापान के शस्त्र डालने पर आज़ाद हिंद
सेना के सैनिकों को कारागार में लूंस दिया गया, जिन्हें कांग्रेसी नेताओं ने छुड़वाया था। नेताजी विमान दुर्घटना के शिकार हो गए।

अंत में अंग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ा। 15 अगस्त, सन 1947 ई. को देश स्वतंत्र हुआ किंतु  खेद की बात यह हुई कि भारत का बँटवारा- भारत और पाकिस्तान में हो गया। देश में जहाँ-तहाँ दंगे हुए। अनेक निर्दोषों को काल के गाल में जाना पड़ा। धन-जन की बड़ी क्षति हुई। नेताओं के दिल काँप गए; किंतु गांधीजी का साहस अडिग था, ये सबको अहिंसा का पाठ पढ़ाते रहे। राम और रहीम को एक मानकर ये इस पद का कीर्तन कराया करते थे-
'ईश्वर अल्लाह तेरे नाम, सबको सन्मति दे भगवान।' ।
मानवता, शांति और अहिंसा का यह देवता हमारे सांप्रदायिक उन्माद पर बलिदान हो गया। 30 जनवरी, सन 1948 ई. को संध्या के पाँच बजे नाथूराम गोडसे ने प्रार्थना सभा-स्थल पर गांधीजी पर तीन गोलियाँ दाग दी और 'हे राम' कहते हुए गांधीजी चिरनिद्रा में सो गए। उनके पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार राजघाट पर सम्मानपूर्वक किया गया। वहीं पर गांधीजी का
समाधि बनी हुई है।

राष्ट्रपिता गांधीजी का जीवन देश को स्वतंत्र कराने, अछूतोद्धार, ग्रामसुधार और हिंदू-मुसलिम एकता को स्थापित करने में व्यतीत हुआ था। अतः इनके आदर्शों को अपनाकर हमें इनके अधूरे कार्यों को पूर्ण करना चाहिए-यही हमारी राष्ट्रपिता के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

1 comment: