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Sunday, April 26, 2020

पालि भाषा का साहित्य

पालि भाषा का साहित्य

पालि का उल्लेख धार्मिक प्रकृत के अन्तर्गत किया जाता है। महात्मा बुद्ध ने जिस भाषा में उपदेश दिया था उसी को 'पालि' माना जाता है। दूसरे शब्दों में इसे धार्मिक प्राकृत कह सकते हैं। पालि शब्द का प्रयोग पहले बुद्ध द्वारा दिए गए उपदेशों अर्थात् वचनों के लिए किया जाता था। कालान्तर में जिस भाषा में ये वणियाँ लिखी गई उसे भी 'पालि' कहा जाने लगा।
“पालि' शब्द के व्युत्पत्ति के सम्बन्ध में विद्वानों के विभिन्न मत  है-
(1) पं० विधुशेखर भट्टाचार्य 'पालि' की संस्कृत के 'पंक्ति' शब्द से निकला मानते हैं- पंक्ति> पन्ति > पत्ति >पट्टी 
पल्लि> पालि। किन्तु ध्वनि-परिवर्तन के नियमों की दृष्टि से यह विकास मान्य नहीं सिद्ध होता।

(2) कुछ लोग मानते हैं कि यह 'पाल्लि' अर्थात गाँव की भाषा थी, इसलिए पालि कहलाई। किन्तु पालि केवल गाँव तक ही सीमित नहीं थी बल्कि एक श्रेष्ठ धार्मिक भाषा थी जिसका प्रयोग नगरों में भी होता था।

(3) मैक्सवेलेसर का मत है कि पालि शब्द का सम्बन्ध पाटलिपुत्र, (ग्रीक'पालिबोध')से है-अर्थात् पाटलिपुत्र (पटना)कीभाषा। किन्तु 'पाटलि' का 'पाडलि' हो
सकता है पालि' नहीं।

(4) भिक्षु सिद्धार्थ पालि' शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत 'पा' धातु से मानते हैं। प्राचीन विद्वानों ने भी ऐसी ही व्युत्पत्ति दी है अर्थात् 'पाति रक्खतीति तस्मात् पालि' अर्थात् अर्थों की रक्षा करती है अतः इसे पालि कहा जाता है।

(5) भिक्षु जगदीश कश्यप ने अपने पालि महाव्याकरण नामक ग्रन्थ में संस्कत के 'पर्याय' शब्द से इसकी व्युत्पत्ति मानी है-जैसे पर्याय > परियाय > पालियाय > पालियाव>पालि। अशोक के शिलालेखों में भी युद्ध के उपदेशों के अर्थ में 'पालियाय' शब्द का प्रयोग मिलता है। अर्थात् पालि का अर्थ है-बुद्धवाणी का पर्याय। यही मत सबसे अधिक समीचीन जान पड़ता है।
मूल स्थान-पालि भाषा का सम्बन्ध अनेक प्रदेशों से जोड़ा जाता है। सिंघल के बौद्धों का विचार रहा है कि पालि मगध देश की भाषा थी। किन्तु यह मत ठीक नहीं। मागधी पूर्वी भाषा है और उसमें संस्कृत की श् ,ष , स् तीनों ध्वनियों में से केवल 'श' ध्वनि है। दूसरी ओर उसमें
केवल 'ल्' ध्वनि है 'र' नहीं है। पालि में इनके स्थान पर क्रमशः 'स्' और ` र` मिलता है 'श्' और ल्' नहीं। रूप-रचना में भी दोनों में भेद है। पालि में कर्ता एक वचन में 'आ' विभक्ति लगती है जबकि मागधी में 'ए' विभक्ति लगती है जैसे धर्म शब्द पालि में 'धम्मो और मागधी में 'धम्म' हो जाता है।
इसी प्रकार विभिन्न विद्वानों ने भी इसका सम्बन्ध विभिन्न प्रदेशों से माना है। डॉ. ग्रियर्य ने इसमें मागधी और पैशाची दोनों के लक्षण देकर इसे मूलत: मगध की जनभाषा माना। जिसे बाद में धर्मप्रचार के लिए तक्षशिला लाया गया। यहाँ यह पैशाची से प्रभावित हुई ।
कुछ विद्वानों ने इसे कौशल प्रदेश की भाषा माना क्योंकि बुद्ध ने स्वयं अपने को 'कोसल खत्तिय कहा है। एक विद्वान् ने इसे उज्जैन की, एक ने विन्धयप्रदेश की और एक ने कलिंग की भाषा माना है। किन्तु वस्तुतःपालि किसी एक प्रदेश की भाषा नहीं बल्कि वह एक मिश्रित भाषा है जिसमें अनेक बोलियों का सम्मिश्रण है। अधिकांश विद्वानों का अनुमान है कि मूल बुद्धवचन मगधी बोली में भी रहे होंगे परन्तु जब उनके संकलन के लिए सभा एकत्र हुई तो उसमें प्रमुख संकलनकर्ता महाकश्यप हुए जो सूरसेन प्रदेश (आधुनिक मथुरा) के
रहने वाले थे और उन्होंने मध्यप्रदेशीय बोली में त्रिपिटक का संकलन किया। यही कारण है कि पालि का सबसे अधिक साम्य शौरसेनी से है और इसीलिए उसमें पैशाची का भी प्रभाव मिलता है। मागधी से अनूदित होने के कारण उसकी भी अनेक विशेषताएँ रह गई। बाद में
यही भाषा कलिंग में प्रचलित हुई और वहाँ त्रिपटिक का प्रचार इसी भाषा में हुआ। सच बात यह है कि पालि बौद्ध के धर्म के प्रचार का प्रमुख माध्यम होने के कारण अनेक प्रदेशों में गई और प्रत्येक की बोलियों के कुछ तत्त्व इसमें आते गए।

विशेषताएँ-पालि की ध्वनि-सम्बन्धी विशेषता यह है कि उसमें संस्कृत के ऋ,लृ,  ऐ,  का लोप हो गया और दो नये स्वरों (ह्रस्व ए तथा ओ) का विकास हुआ जैसे संस्कृत
'ओष्ठ' पालि 'ओदृट'। व्यजंनों में श,  ष   का लोप हो गया उनके स्थान पर केवल  स् रह गया।
रूप-रचना की दृष्टि से इसकी कुछ प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं-
(1) पालि की रूप-रचना में सरलता की प्रवृत्ति आरम्भ हो गई थी किन्त कई विशेषताएँ वैदिक संस्कृत की भी रह गई। पालि में पद के अन्त में आने वाले व्यंजन का प्राय:लोप हो गया अथवा इसके साथ जुड़ गया। इसका परिणाम यह हुआ कि संस्कृत में अजन्त (स्वरान्त) और
हलन्त (व्यंजनान्त) का जो संज्ञा के शब्दों का विभाजन था वह पालि में लुप्त हो गया और फिर स्वरान्त हो जाने पर उसके रूप भी स्वरांत शब्दों की तरह चलने लगे जैसे 'रामस्य' की तरह 'अग्गिस्स'। क्रिया रूपों में भी सरलता आ गई किन्तु एक बात विशेष रूप से विचारणीय है कि
पालि में लौकिक संस्कृत से न मानकर प्राचीन वैदिककालीन बोलियों से माना जाता है।

(2) रूप-रचना की दृष्टि से पालि की सर्वप्रमुख विशेषता यह है कि उसमें संयुक्त व्यंजनों के पूर्व केवल हस्व ध्वनि का ही प्रयोग होता है जैसे संस्कृत में मार्ग पालि में मग्न। कार्य> पालि में कज्ज। 
(3) कहीं-कहीं संयुक्त व्यंजनों के समीकरण के स्थान पर स्वर-भक्ति भी पालि में मिलती है जैसे संस्कृत के पद्म के स्थान पर पालि में पदुम , संस्कृत में स्नेह-पालि सिनेह। 
(4) द्विवचन का लोप हो गया।

(5) स्वराघात के स्थान पर बलाघात का विकास हुआ।

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