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Thursday, April 23, 2020

प्रतीक की परिभाषा ||हिंदी साहित्य ||काव्य शास्त्र


प्रतीक की परिभाषा ||हिंदी साहित्य ||काव्य शास्त्र 

अभिव्यक्ति को प्रभावशाली बनाने के लिए मनुष्य विविध प्रकार के माध्यमों को अपनाता है। प्रतीक उन्ही माध्यमों में से एक माध्यम है। सृष्टि के आरम्भ से ही प्रतीकों का प्रयोग देश और काल की आवश्यकता के अनुरूप होता रहा है और आज साहित्य तथा कला के क्षेत्र में प्रतीकों के प्रयोग को महती आवश्यकता के रूप में स्वीकार किया जा रहा है

प्रतीक का सामान्यतः अर्थ

अंग, पता, चिन्ह, निशान आदि प्रतीक हैं। इसका व्युत्यत्तिपरक अर्थ है- “प्रतीयते अनेन इति प्रतीकः।"

काव्य और साहित्य के  सन्दर्भ मे इसका प्रयोग विशिष्ट भावों की अभिव्यंजना के लिए होता है। प्रतीक को परिभाषित करते हुए आचार्य शुक्ल ने लिखा है कि- "किसी देवता का प्रतीक सामने आने पर जिस प्रकार उसके स्वरूप और उसकी विभूति की भावना चट मन में आ जाती है, उसी प्रकार काव्य मे आया हुई कुछ वस्तुएं विशेष मनोविकारों या भावनाओं को जागृत कर देती है जैसे -कमल माधुर्य और गंभीरता का, आकाश सूक्ष्मता और अनन्तता का, सर्प से क्रूरता और कुटिलता, अग्नि से तेज और क्रोष का, वाणी से विद्या का, चालक से नि:स्वार्थ प्रेम का संकेत मिलता है।"

डा० राजनाथ शर्मा इसे 'गागर में सागर' भरने की क्रिया स्वीकार करते हैं और कहते है  - "प्रतीक की सहायता से बहुत विस्तृत व्याख्या की अपेक्षा करने वाली बात को अत्यन्त संक्षेप में प्रस्तुत कर दिया जाता है।"

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रतीक में प्रतीकात्मक अर्थ समाहित होता है और वह अर्थ देशकाल और परिस्थितियों से संबद्ध तथा परम्परागत होता है।

प्रतीकवाद का अभ्युदय- प्रतीक का अभ्युदय 1885 ई० में फ्रांस में हुआ। प्रतीकवादियों में मालकार्वे का नाम विशेष उल्लेखनीय है। इनके अनुसार घटनाएँ या व्यक्ति अपने आप में क्षुद्र,क्षणिक या महत्वहीन हैं। केवल प्रतीकवादी कलाकार ही अपनी कल्पना के द्वारा उनके महत्त्व को प्रदर्शित कर सकता है। यही प्रतीकवादी कलाकार की विशेषताएँ हैं। प्रतीकवादी धारणा के अनुसार ध्यान और प्रार्थना से जो आनन्दानुभूति भक्त को मिलती है वही आनन्दानुभूति कवि का प्रतीकवादी
शिल्प होता है। चूंकि प्रतीक विषयों का साध्य सौन्दर्य द्वारा विवेचित था, इसलिए प्रतीकवाद अपने आर्विभाव के बाद साहित्यिक परिवेश में विशेष लोकप्रिय गौरव को प्राप्त किया।

वर्गीकरण- विभिन्न प्राच्य एवं पाश्चात्य समीक्षकों ने अपने मतानुसार प्रतीकों का वर्णन किया है जिसमें 'अरबन, पीट्स एवं आचार्य शुक्ल' तथा 'प्रेम-नारायण' के प्रतीक के वर्गीकरण को उद्घाटित किया जा सकता है।

(1) परंपरामुक्त या स्वच्छंद प्रतीक
 (2) वास्तविक प्रतीक
(3) अन्तर्दृष्टिपरक प्रतीक

परंपरामुक्त प्रतीकों में सुबोधता एवं सरलता होती है। इनके अन्तर्गत कलात्मक एवं वैज्ञानिक प्रतीक आते हैं। धार्मिक सम्प्रदायों में प्रचलित प्रतीक को इसी वर्ग में रखा जाता है।
दूसरों वर्ग के प्रतीकों में कला एवं धर्म से संबंधित प्रतीक आते हैं,
अर्न्तदृष्टि प्रतीक सदैव वास्तविक प्रतीक होते हैं। काव्य एवं धर्म के क्षेत्र में इनका प्रयोग किया जाता है।

आचार्य शुक्ल ने प्रतीकों की दो कोटियाँ निर्धारित की हैं-
(1) मनोविकारों या भावनाओं को जागृत करने वाले प्रतीक।
(2) विचारों को जगाने वाले प्रतीक।

डा० प्रेमनारायण शुक्ल ने 4 प्रकार के प्रतीकों को बताया है-
(1) परंपरागत प्रतीक 
(2) देशगत प्रतीक
 (3) व्यक्तिगत प्रतीक 
(4) युगगत प्रतीक

कतिपय प्रमुख प्रतीकों का परिचय-

(1) भावोत्प्रेरक प्रतीक- जिसमें राग प्रधान रहता है। जैसे-कमल, चन्द्रमा, कुमुदनी इसी काेटि के प्रतीक है।

(2) विचारोत्पादक प्रतीक- जिसमें विचार-चिन्तन की प्रमुखता रहती है। जैसे-रावण, जयद्रथ आदि।

 (3) वैव्यक्तिक प्रतीक- जिनका संबंध कवि की निजी अनुभूतियों और विचारों से रहता 
है जैसे कबीर द्वारा  प्रस्तुत- 'माली' और कलियाँ।

(4)परंपरागत प्रतीक- जो प्रतीक परंपरा से प्रचलित हैं।
जैसे -संत साहित्य के प्रतीक, राखी, बिन्दी आदि।

 (5)परम्परामुक्त प्रतीक- इनका प्रयोग कवि मनमाने ढंग से करता है। नई कविता के इसी कोटि के हैं। जैसे-सॉप (ईष्या का प्रताका)

(6)भावपरक प्रतीक- जहाँ शब्दाश्रित न होकर प्रतीक भावाक्रित हो।
जैसे- उषा का था डर में आवास।
गुबुल का मुख में मृदुल विमन्

(7)व्याख्यात्मक प्रतीक-व्याख्यात्मक प्रतीकों में दृश्य साम्य को उभार दिया जाता है। 
जैसे- 'सिंह' के द्वारा निडरता, साहस आदि प्रकट किया जा रहा है,
(8) अन्तर्दृष्टि परक प्रतीक-ये प्रतीक गहन अध्ययन पर आधारित होते हैं। कामायनी के कैलास मानसरोवर आदि इसी प्रकार के प्रतीक हैं।

(9) प्राकृतिक प्रतीक- ये प्रकृति से सीधे लिए जाते हैं।

देश-काल-प्रतीकों के प्रयोग में देशकाल की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।  विभिन्न प्रकार के देशों में विभिन्न प्रकार के प्रतीक मिलते हैं। जैसे यूरोप में शीत अधिक पड़ती है इसलिए गमी को यहाँ पर सुख, उल्लास और हर्ष का प्रतीक माना जाता है।
सभ्यता और संस्कृति का भी प्रतीक निर्माण में प्रभाव पड़ता है। आब निवासी कोहिनूर बुलबुल आदि से जिन अर्थों का बोध होता है, वह भारत या अन्य देशों के निवासी को नहीं होता। काल का भी प्रतीकों पर प्रभाव पड़ता है। समय के अनुसार प्रतीकों का प्रयोग घटता-
बढ़ता रहता है।

काव्य में प्रतीकों का महत्त्व

(1) विषय की व्याख्या- प्रतीक विषय की व्याख्या करके उसे बोधगम्य बना देते हैं।
जैसे- राम-नाम रस भीनी चदरिया, मुनियों के चूक की व्याख्या मैली भीनी चदरिया।

(2) विषय को स्वीकृति योग्य बनाना- प्रतीकों के माध्यम से प्रतीकों को स्वीकृति योग्य बनाया जाता है-

रोज पड़ता रहा पानी,
तू हरामो खान दानी।

(3) पलायन का अवसर- पलायन की प्रवृत्ति छायावादी कवियों में पर्याप्त पायी जाती है। उसे सहज रूप में प्रतीकों के माध्यम से व्यक्त करते हैं।

लेचल मुझे भुलावा देकर
मेरे नाविक धीरे-धीरे

(4) सुप्त अनुभूति की अभिव्यक्ति- सुप्त भावनाएँ प्रतीकों के माध्यम से सहजरूप में व्यक्त की जा सकती हैं-

निर्दय उस नायक ने
निपट निष्ठुराई की
झोंकों की झाड़ियों से
सुन्दर सुकुमार देह
सारी झकझोर डाली।

(5) अलंकरण का अचूक साधन- इस रूप में पर्याप्त प्रयोग हुआ है। कामायनी का रूपक इसी आधार पर उभरा है।




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