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Tuesday, April 28, 2020

प्राकृत मध्यकालीन आर्य भाषा

प्राकृत के भेद

प्राकृत मध्यकालीन आर्य भाषा 


प्राकृत मध्यकालीन आर्य भाषा की दूसरी अवस्था है। इसका काल खंड 1 ईस्वी सन के आंरभ से 500 ईस्वी तक स्वीकार किया जाता है।

प्राकृत और संस्कृत का सम्बन्ध 


हेमचन्द्र, मार्कण्डेय, तथा सिंहदेव आदि विद्वानों का मानना है कि प्राकृत संस्कृत  से विकसित हुई है। परंतु कुछ अन्य विद्वानों का मानना है कि प्राकृत जन भाषाओं से निर्मित हुई है और उसी से संस्कृत का भी विकास हुआ है। 

अध्यन के स्रोत 


आदिकाल का बौद्ध और जैन साहित्य मागधी और अर्धमागधी प्राकृतों में लिखा गया है। इसके आलावा सेतुबंध तथा गौडवहो जैसे महाकाव्य तथा गाथासप्तशती जैसे खंड काव्य भी लिखें गए है। 

प्राकृत के भेद 


वररूचि ने क्षेत्र के हिसाब से प्राकृत के चार शौरसेनी प्राकृत, महाराष्ट्री, मागधी प्राकृत, एवं पैशाची प्राकृत माना है। डॉ धीरेन्द्र वर्मा ने एक कदम आगे बढ़ते हुए अर्धमागधी को भी स्वीकार किया है। 

क) मागधी प्राक़त- मागधी मूलत: मगध की भाषा थी। देश के पूर्वी भाग में स्थित होने के परिणामस्वरूप यह अपने समकालीन भाषाओं से अधिक परिवर्धित थी। मागधी प्राकृत में 'र' ध्वनि के स्थान पर 'ल' ध्वनि का प्रयोग होता है। र ध्वनि का प्रायः अभाव-सा है।
समस्त ऊष्म ध्वनियों (स, श, ष) के स्थन पर केवल 'श' का प्रयोग होता है यह इसकी महत्त्वपूर्ण विशेषता है।

(ख) शौरसेनी प्राकृत- मथुरा के निकटवर्ती प्रदेश की भाषा शौरसेनी कहलाती है। मध्यदेशीय भाषा होने के कारण यह अन्य प्राकतों की अपेक्षा कम परिवर्तित हुई है। इसलिए संस्कृत से इसकी समीपता अन्य प्राकृतों की अपेक्षा अधिक है। आधुनिक (पाश्चमा) हिन्दी के विकास के मूलसूत्र शौरसेनी प्राकृत से सम्बद्ध है। संस्कृत नाटकों में इस भाषा का प्रयोग मिलता है।

ग) अर्द्धमागधी प्राकृत- मागधी एवं शौरसेनी प्राकत के बीच की भाषा अर्द्धमागधी प्राकृत है। यही कारण है कि इसमें मागधी और शौरसेनी दोनों प्राकतों की विशेषताएँ मिलती है। अर्द्धमागधी की मुख्य विशेषता है कि-'र', 'ल' ध्वनियों का प्रयोग एवं तीनों उष्म ध्वनियाँ (श, ष, स) के स्थान पर एक ही 'स' ध्वनि का प्रयोग तथा स्वर मध्य 'ग', 'य' श्रुति का प्रयोग मिलता है- (एक > एग, सागर > सायर)।

(घ) महाराष्ट्री प्राकृत- महाराष्ट्री प्राकृत सभी प्राकृतों से विकसित एवं साहित्य की भाषा है। 'सेतुबन्धु' और 'गाहा सतसई महाराष्ट्री प्राकृत में ही लिखी गई है। महाराष्ट्री प्राकृत का क्षेत्र मध्यदेश रहा है। वर्तमान मराठी का विकास महाराष्ट्री प्राकृत से हुई है। महाराष्ट्री शौरसेनी
का परवर्ती विकसित रूप है। शौरसेनी और मागधी महाराष्ट्री में केवल आत्मगत भेद अवश्य है पर स्थानगत अन्तर नहीं है।
महाराष्ट्री में स्वर मध्यम् व्यंजन पूर्णत: लुप्त हो गई है जबकि शौरसेनी  में स्वर मध्यम अघोष व्यंजन ध्वनि सघोष में परिवर्तित होकर सुरक्षित हो गई है। स्वर मध्यम महाप्राण व्यंजन शौरसेनी में अभी है जबकि महाराष्ट्री में उस स्थिति में व्यंजन लुप्त हो गया है केवल महाप्रणत्व
से संस्कृत कथयतः > शौरसेनी > 'कथेदु > महाराष्ट्री > 'कहेनु।

(ङ) पैशाची प्राकृत- भारत के पश्चिमोत्तर क्षेत्र में पैशाची भाषा का प्रयोग होता है। इस प्राकृत में साहित्य नहीं के बराबर ही मिलता है। भाषा की एक रचना गुणाढ्य की 'वुडकहा' (वृहत्कथा का उल्लेख किया जाता है) उसका मूल पाठ पैशाची में नहीं मिलता है। पैशाची की मध्यम स्पर्श व्यंजन ध्वनि का लोप नहीं होता।
'वडुकहा' में 'त' व्यंजन का लोप है- कथा > कहा।
प्राकृतों में होने वाले परिवर्तनों को देखने से स्पष्ट हो जाता है कि उनकी दिशाएँ प्रायः वही हैं जिनका सूत्रपात मध्यकाल के प्रथम सोपान में हुआ था।

प्राकृत की भाषा सम्बन्धी विशेषता 


1- प्राकृत में य के स्थान पर ज का प्रयोग होने लगा 
Ex. यश >जस 
य:>जो 

2-क्षतिपूरक दीर्घीकरण की परम्परा प्राम्भ हुए अर्थात सरलीकरण हुआ जिसके लिए द्वित्वीकरण की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई। 
Ex.मृत्यु>मिच्चु>मीच 

3-  कारकों की रूप रचना के संबंध में पालि से ही विभिन्न कारकों को एकसमान बनाने की परंपरा आरंभ हो चली थी । इस प्रक्रिया में पालि में सम्प्रदान और संबंध कारकों के रूप एक से हो गए थे, अब कर्ता और कर्म के बहुवचन रूप भी एक से हो गए।  

4. क्रिया की रचना में संस्कृत की तुलना में कुछ विशेष
अंतर प्राकृत में दिखाई देते हैं। ऐसा सबसे महत्वपूर्ण
परिवर्तन यह है कि प्राकृत में भूतकाल के रूप में कृदंतों
का प्रयोग तेजी से बढ़ने लगा। ये पालि में भी शुरू हो
गया था किंतु प्राकृत में इसकी स्वाभाविकता सहज ही
दिखाई देती है। कृदंतों के कारण क्रियाएँ लिंग भेद से
बदलने लगी किंतु उनमें पुरुष भेद समाप्त होने से जटिलता कम हो गईं।

5. प्राकृत में परसर्गों का विकास पालि की तुलना में काफी अलग स्तर पर दिखाई देता है। उदाहरण के लिए, इसकाल में 'कए', 'केरक' तथा 'मज्झ' परसर्ग दिखते हैं।
जो आगे चलकर 'का, के, की' और 'में' के रूप में विकसित हुए। 

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