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Wednesday, April 29, 2020

रेखाचित्र

रेखाचित्र 



रेखाचित्र साहित्य की आधुनिक विधा मानी जाती है। जैसा की नाम से स्पष्ट है रेखाचित्र=रेखा+चित्र। रेखा से चित्र का निर्माण करना। दरअसल रेखाचित्र पर चित्रकला का गहरा प्रभाव है। चित्रकला में चित्रकार रेखाओं के माध्यम से किसी वस्तु, व्यक्ति या स्थान आदि का चित्र पेपर या दिवार पर उकेरता है। रेखाओं के माध्यम से जीवन के विविध रूपों आकार देने वाली  प्रणाली की इस विशेषता को अपनाकर हिंदी साहित्य में शब्दों के माध्यम से जीवन से विविध रूपों साकार करने वाले शब्द चित्रों को रेखाचित्र कहा गया है।

रेखाचित्र का विषय 


सामान्यत:  माना जाता है कि रेखाचित्र सिर्फ  व्यक्ति के ऊपर लिखें जाते है परंतु ऐसा नही है, रेखाचित्र वस्तु, स्थान तथा परिवेश का भी हो सकता है। साथ ही साथ इसमें काव्य, कथा तथा गीत के भी तत्त्व पाए जाते है। 

व्यक्तिपरक रेखाचित्र की बात की जाए तो ये किसी महान व्यक्तित्व पर, किसी परिचित पर या फिर साधु संतो, समाजसेवकों, देशसेवकों या साहित्यकारों के सम्बन्ध हो सकता है। 

स्थानपरक रेखाचित्र के विषय गांव, शहर क़स्बा आदि हो सकता है। स्थानपरक रेखाचित्र के माध्यम से स्थान विशेष के सम्पूर्ण समाज का चित्र उकेरा जाता है। रेखाचित्र कैसा होगा यह उस समाज पर निर्भर करता है। उदहारण के तौर पर शहर और गांव के समाज में प्रयाप्त अंतर होता है शहर की जनसंख्या घनत्व जायदा होती है वहा पढ़े लिखें लोगो की संख्या ज्यादा है, वहा स्वास्थ सुविधाए अधिक है आदि। इन सबका प्रभाव रेखाचित्र पर पड़ना स्व्भाविक है। 

रेखाचित्र संस्मरण नही होता है कुछ लोग इसे संस्मरण हि मन बैठते है परंतु ऐसा नही है है संस्मरण और रेखाचित्र पृष्ठभूमि सामान होते है परंतु आत्मपरकता का ना होना, वर्त्तमान या भूतकाल किसी में भी लिखा जाना आदि इसे संस्मरण से अलग करते है। 

रेखाचित्र का शिल्प 


रेखाचित्र का शिल्प कैसा होगा यह काफ़ी कुछ रेखाकार पर निर्भर करता है उदहारण के तौर पर इसे  रेखाकर रामवृक्ष बेनीपुरी के माध्यम से समझ सकते है। रामवृक्ष को माक्सवादी दृष्टिकोण का रेखाकार माना जाता है। इन्होने 'माटी की मूरते',गेहूं और गुलाब, मील के पत्थर आदि महत्वपूर्ण रेखाचित्र लिखें है। यथार्थ के साथ कल्पना और भाउकता का समन्वय, विषय वैविध्य तथा शब्दों और वाक्यों का सधा प्रयोग इसके आलावा प्रचलित मुहावरें आदि का प्रयोग रामवृक्ष बेनीपुरी को सबसे अलग बनाती है।उसी प्रकार अन्य रेखाकार कि  भी अपनी भाषा और शिल्प जैसी विशेषताएं होती है।जो उन्हें एक दूसरे से अलग बनती है। 

छायावाद और रेखाचित्र का सम्बन्ध 


रेखाचित्र की शुरुआत छायावाद युग से ही मानी जाती  है। बात करें छायावाद की तो छायावाद (1918-1936) के काल को माना जाता है। छायावाद के कवि श्रीराम शर्मा, बनारसीदास चतुर्वेदी तथा छायावाद की महत्वपूर्ण नाम महादेवी वर्मा ने रेखाचित्र के विकास में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। श्रीराम शर्मा का 'बोलती प्रतिमा' महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय रेखाचित्र माना जाता है। बनारसीदास चतुर्वेदी रेखाचित्र में अत्यंत लोकप्रिय हुए उन्होंने संतों, समाजसेवियों, देशशसेवको, और साहित्यकारों पर सार्थक और यादगार रेखाचित्र लिखें है। उनके प्रमुख रेखाचित्रों में मधुकर, हमारे आराध्या, और 'रेखाचित्र' नमक रेखा चित्र  प्रमुख रूप से हमारे सामने है। किन्तु, रेखाचित्र को पृथक सार्थक पहचान महादेवी वर्मा ने दिलाया है। महादेवी वर्मा के रेखाचित्र की बात की जाए तो अतीत के चलचित्र, समृति की रेखाएं, पथ के साथी और मेरा परिवार उनके प्रभावकारी और उल्लेखनीय रेखाचित्र है। पद्म सिंह शर्मा का पद्मपराग प्रथम रेखाचित्र माना जाता है। उन्ही से प्रभावित होकर अन्य रेखाकार भी सामने आए। 

निष्कर्ष 

रेखाचित्र ना हि   है ना हि संस्मरण और ना हि यात्रा वृतांत। परंतु वर्त्तमान में ये विधाएँ एक दूसरे के नजदीक आयी है और एक दूसरे से प्रभावित हुई है। जिसमे रेखाचित्र एवं संस्मरण सबसे करीब मानी जाती है। छायावाद से लेकर आज तक लघु पत्र पत्रिकाओ में रेखाचित्र अपना स्थान प्रमुखता से लिए हुए है। 


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