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Monday, April 6, 2020

अमीर खुसरो की काव्य संवेदना


अमीर खुसरो की काव्य संवेदना



हिंदी साहित्य के आदि काल के अंत और भक्तिकाल के प्रारम्भ के कवि अमीर खुसरो को खाड़ी बोली का प्रथम कवि मना जाता है. हिंदी (खाड़ी बोली का सम्बन्ध ) उन्ही कि रच नाओ में हिन्दवी से उल्लेख होता है.

हालांकि वे हिन्दवी के अतिरिक्त फ़ारसी अरबी आदि भाषाओ के भी उतने ही बड़े ज्ञाता थे परन्तु उनकी पहचान का आधार हिंदी ही कि रचनाएँ ही है. आज के खाड़ी बोली का सवरूप  अगर उस काल में किसी के रचनाओं में देखना हो तो अमीर खुसरो से बेहतर कोई उदाहरण नही  है. 

उन्होंने खुद कहा है -" मैं तूती ए हिन्द हू. अगर वास्तव में मुझे जानना चाहते हो तो हिंदी में पूछो. मैं तुम्हे अनुपम बाते बता सकूगा. " 

अमीर खुसरो का चरित्र बहुत बड़ा था वे अनेक भाषाओ  के ज्ञान  के साथ साथ कुशल कवि, गीतकार, लेखक,  भी थे. उन्होंने अपने जीवन काल में 7 सुल्तानो का आश्रय प्राप्त किया. जिनमे बलबन, मुहमद कैकुबद, जलालुदीन खिलजी, अलाउदीन  खिलजी, मुहमद शाह खिलजी, तथा गयासुदीन तुगलक इनके आश्रय दाता थे. 

अमीर खुसरो का पूरा नाम अबुल हसन यमीनुद्दीन था। अमीर खुसरो दहलवी का जन्म में उत्तर-प्रदेश के एटा जिले के पटियाली नामक ग्राम में गंगा किनारे हुआ था। गाँव पटियाली उन दिनों मोमिनपुर या मोमिनाबाद के नाम से जाना जाता था.
अमीर खुशरो की 99 रचनाओं का उल्लेख हुआ है कइँती उसमे वर्तमान में 22 प्राप्त है. हिंदी में खुसरो की तीन रचनाएँ मानी जाती है किन्तु तीनो में सिर्फ ख़ालिकबार ही उपलब्ध है. खालिकबारी फ़ारसी -  हिन्दवी शबदकोष है. इसके आलावा इनकी प्रसिद्धि का आधार पहेलियाँ,  मुकरीय, दो सूखने,  आदि है जो इनकी मौलिक कृति है इनसे पहले किसी ने इस प्रकार की रचनाकार नही की है. 

अमीर खसरो ने उपर्युक्त ग्रंथों के अलावा कई और ग्रंथों की भी रचना की है जो इस प्रकार हैं-मजनू-लैला, शीरीन-खुसरो, हश्न-बिहश्त, तारीख-ए-दिल्ली, मतला-उल-अनवर आदि
खुसरो का अन्तिम ऐतिहासिक ग्रंथ‘तुगलक’ नामक ग्रंथ है जो उन्होंने गयासुद्दीन तुगलक के राज्य-काल में लिखा था. 

सुल्तान ग्यासुद्दीन तुगलक  के साथ खुसरो बंगाल के आक्रमण में भी सम्मिलित हुआ. उनकी अनुपस्थिति में ही दिल्ली में उनके गुरु शेख निजामुद्दीन औलिया की मृत्यु हो गयी.इस शोक को अमीर ख़ुसरो सहन नहीं कर सके और दिल्ली लौटने पर 6 मास के भीतर ही सन 1325 ई. में ख़ुसरो ने भी अपनी इहलीला समाप्त कर दी। ख़ुसरो की समाधि शेख की समाधि के पास ही बनायी गयी.

शेख निज़ामुद्दीन औलिया अफ़ग़ान-युग के महान् सूफ़ी सन्त थे.अमीर ख़ुसरो आठ वर्ष की अवस्था से ही उनके शिष्य हो गये थे और सम्भवत: गुरु की प्रेरणा से ही उन्होंने काव्य-साधना प्रारम्भ की। यह गुरु का ही प्रभाव था कि राज-दरबार के वैभव के बीच रहते हुए भी ख़ुसरो हृदय से रहस्यवादी सूफी सन्त बन गये। ख़ुसरो ने अपने गुरु का मुक्त कंठ से यशोगान किया है और अपनी मसनवियों में उन्हें सम्राट से पहले स्मरण किया है.

अमीर खुसरो की विभिन्न रचनाओं में हिंदी का सवरूप निम्न रूप में दिखता है-
अपनी छवि बनाई के मैं तो पी के पास गयी |
जब छवि देखी पीहू की सो अपनी भूल गयी ||(दोहा )

मुकरियां के कुछ उदहारण:

A. नीला कंठ और पहिरे हरा
शीश मुकुट नाचे वह खड़ा
देखत घटा अलापे जोर
ऐ सखि साजन, ना सखी मोर.

A. सेज पडी मेरी आँखों आया
डाल सेज मोहे मेज दिखाया
किससे कहूँ मजा मैं अपना
ऐ सखि साजन, ना सखि सपना.

B. उठा दोनों टांगन विच डाला
नाप तौल के देखा भाला
मोल तोल में है वह महंगा
ऐ सखि साजन, ना सखि लहंगा.

C.अति सुन्दर जग चाहे जाको,
मैं भी देख भुलानी वाको,
देख रुप माया जो टोना |
ए सखी साजन, ना सखि सोना || (मुकरिया)

पहेलियों के कुछ उदहारण:

1. बंद किये से निकला जाए
छोड़ दिस से जावे आए
मूर्ख को देही नहीं सूझे
ज्ञानी हो इक दम से बूझे.

2. बाल नोचे कपड़े फटे
मोती लिए उतार
यह विपता कैसी बनी
जो नंगी कर दई नार.

3. बनी रंगीली शर्म की बात
बे –मौसम आयी बरसात
यही अचम्भा मुझको आये
खुशी के दिन क्यों रोती जाए

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