🇧 🇪  🇨 🇦 🇷 🇪 🇫 🇺 🇱 🇱 🙏

कोरोना हारेगा हम जीतेंगे। घर में रहे सुरक्षित रहे ��

Monday, April 20, 2020

प्रदूषण की समस्या पर निबंध इन हिंदी

प्रदूषण की समस्या/प्रदूषण की समस्या पर निबंध इन हिंदी

प्रदूषण की समस्या निबंध
Pollution 

प्रदूषण का अर्थ है वातावरण या वायुमंडल का दूषित होना। प्रदूषण की समस्या आधुनिक वैज्ञानिक युग की देन है। इस समस्या से विश्व के अधिकांश देश ग्रसित हैं। प्रकृति ने मानव की जीवन-प्रक्रिया को स्वस्थ बनाए रखने के लिए, उसे शुद्ध वायु, जल और वनस्पति तथा
भूमि प्रदान की है। परंतु जब किन्हीं कारणों से ये सब दूषित हो जाती हैं तो मानव तथा अन्य प्राणियों के स्वास्थ्य के लिए विभिन्न प्रकार से हानिकारक हो जाती हैं।
Nibadh padhiye 

Mahatma gandhi 
Dahej pratha
Sardar patel lekh

प्रदूषण चार प्रकार का होता है-वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण और भूमि प्रदूषण।आधुनिक युग में आर्थिक प्रगति के नाम पर अनेक प्रकार के छोटे-बड़े कल-कारखानों और उद्योगों का विकास मानव ने अपनी भौतिक सुख-सुविधाओं को प्राप्त करने के लिए कर लिया है। जनसंख्या वृद्धि के कारण ग्राम, नगर और महानगरों का आकार बढ़ता जा रहा है। वन क्षेत्रों ऐसे यंत्रों का निर्माण किया जा रहा है जो रात-दिन ध्वनि और धुआँ उगलते रहते हैं। नदियों पर बाँध बनाए जा रहे हैं। परिवहन की सुविधा उपलब्ध होने के कारण ग्रामीण रोजगार की तलाश में बड़ी संख्या में नगरों-महानगरों की ओर जा रहे हैं। महानगरों के लोग अपने उद्योग-धंधों को गाँवों की ओर बढ़ा रहे हैं। इससे प्रदूषण को बढ़ावा मिल रहा है।

कल-कारखानों का दूषित और अनियंत्रित जल-मल बाहर निकलकर दुर्गंधयुक्त गैस फैलाता है। कारखानों की धुआँ उगलती हुई चिमनियाँ दूर-दूर तक वातावरण को दूषित करती हैं, इनसे वायुमंडल दूषित हो जाता है। इससे साँस और फेफड़ों के रोग पनपते हैं, आँखें खराब होती हैं। वाहनों और मशीनों के शोर, यातायात के साधनों के हार्मों की चिल्ल-पों, चीखते लाउड-स्पीकर,
तेज़ आवाज़ में चलते टेलीविज़न, रेडियो, टेपरिकार्डर आदि से ध्वनि प्रदूषण फैलता है। सुनाई देना कम हो जाता है, रक्तचाप बढ़ जाता है। शारीरिक व मानसिक रोग पनपते हैं। इससे मानव स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव पड़ रहा है।

जल स्रोतों में नहाने, कपड़े धोने, मल-मूत्र त्यागने, जानवरों के नहलाने, शवों की राख बहाने आदि से भी जल प्रदूषित हो जाता है जिससे हैजा, आंत्रशोथ तथा पेचिश जैसे रोग हो जाते हैं। उपज बढाने के लिए भूमि में विभिन्न प्रकार की रासायनिक खादों को मिलाया जा रहा है जिससे भूमि प्रदूषण होता है। ऐसी प्रदूषित भूमि में उत्पन्न होने वाला खाद्यान्न, साग-सब्जियाँ भी प्रदूषित हो जाती हैं। इनके खाने से मानव के स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव पड़ते हैं। हमारे देश में ही नहीं, विश्व के अन्य देशों में भी प्रदूषण की समस्या निर्बाध रूप से बढ़ रही है। यह ठीक है कि विज्ञान की प्रगति के साथ औद्योगीकरण का विकास भी अनिवार्य हो गया
है। यही रास्ता है जिस पर चलकर कोई देश आर्थिक रूप से संपन्न हो सकता है। किंत फिर भी हमें आधुनिक सभ्यता के पर्याय ध्वनि-विस्तारक यंत्र, आँखों की चौंधियाती बत्तियाँ, रसायनों से बने खादय और वस्त्र, औषधियाँ और सौंदर्य प्रसाधन, परिवहन के साधनों की अनिवार्यता पर अंकुश लगाना पड़ेगा।

इसके अतिरिक्त मानव निर्मित कृत्रिम वातावरण व प्रकृति प्रदत्त वातावरण में संतुलन कायमकरना होगा। वनों की अंधाधुंध कटाई को रोकना पड़ेगा। वन क्षेत्र बढ़ाने के लिए वृक्ष लगाने होंगे। जनसंख्या पर नियंत्रण करना पड़ेगा। खतरनाक रसायनों का कम-से-कम प्रयोग करना पड़ेगा। अणुबमों के विकास तथा परीक्षण पर रोक लगानी पड़ेगी, तभी आधुनिक सभ्यता में जीने वाला मानव स्वस्थ और सुखी जीवन व्यतीत कर सकेगा।

No comments:

Post a Comment