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Monday, April 20, 2020

विज्ञान: वरदान या अभिशाप पर निबंध | Essay on Science : Blessing or Curse in Hindi

विज्ञान: वरदान या अभिशाप पर निबंध | Essay on Science : Blessing or Curse in Hindi

Essay on science
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इस ब्रह्मांड में मानव ही ऐसा जीव है जो सदैव अपनी वर्तमान परिस्थिति से असंतुष्ट रहा है। उसकी इच्छाएँ अतृप्त रही हैं। जो कुछ उसे उपलब्ध है उसमें संतुष्टि नहीं, जो कुछ उससे दूर है उसे पाने में प्रयत्नशील है। इस प्रकार की कौतूहल एवं जिज्ञासापूर्ण प्रवृत्ति ने ही मानव को नई-नई खोजों की ओर प्रेरित किया, परिस्थितियाँ करवट लेती रहीं, सभ्यता पनपती रही
और उसकी आवश्यकताएँ बढ़ती गईं। उनको पूर्ण करने का अवलंबन बना विज्ञान। जिसके बल पर वह मोटर, रेलगाड़ा, वायुयान आदि का यात्रा स संतुष्ट न रहकर मंगल ग्रह पर राकेट-यात्रा की तैयारी कर रहा है।

आज के इस प्रगतिशील युग में चलचित्र का स्थान टेलीविज़न ले रहा है। सूती-रेशमी वस्त्रों के स्थान पर रसायनों से निमित परिधानों का प्रयोग हो रहा है। धातुओं का स्थान प्लास्टिक ने ले लिया है। आज विज्ञान ने वरदानस्वरूप असंख्य आश्चर्यजनक परिवर्तन कर दिए हैं। यदि आज हमारे पूर्वज इस मायावी दुनिया में आ जाएँ तो वे आश्चर्यचकित हुए बिना नहीं रह सकते। वे
इसकी परीलोक स तुलना करने लग जाएंगे। सच तो यह है कि आज विज्ञान ने विश्व को ऐसी महान शक्तियाँ प्रदान की हैं जिनके बल पर वह द्रुतगति से प्रगति के पथ पर बढ़ रहा है। 

पर विज्ञान की शैशवावस्था ही मानव-कल्याण के लिए हितकर सिद्ध हुई है, प्रौढ़ावस्था अहितकर बनी। आज समूचा विश्व इसके हाथ का खिलौना बन चुका है। हमारा भविष्य अब इसकी दया पर ही अवलंबित है। उसकी तनिक-सी भूल उसको भस्म कर सकती है, उसके
अस्तित्व को मिटा सकती है। इसकी इस शक्ति से भयभीत बड़े-बड़े विचारक इस चिंता में लगे हैं कि ऐसा कौन-सा उपाय किया जाए जिससे विज्ञान मानव-जाति के लिए वरदान बना रहे, अभिशाप न बने। इस बात की वास्तविकता में पहुँचा जाए, तो पता चलता है कि इसमें
विज्ञान का दोष नहीं। विज्ञान तो एक महान शक्ति है, इसका उपयोग आपके हाथ में है, जैसे• अग्नि को ही लीजिए। इसे आप भोजन पकाने के काम में ला सकते हैं, और विश्व को भस्म करने में भी। इसमें दोष है आपकी स्वार्थलिप्सा और बुरी भावनाओं का। इसका सदुपयोग या दुरुपयोग आपके हाथ में है। 

विज्ञान का वरदान मानव-कल्याण की अमूल्य निधि है। मानव-जाति कभी भी विज्ञान के ऋण से उऋण नहीं हो सकती। विश्व का विशाल प्रांगण आज मनुष्य के घर का कोना बन चुका है। बरसों की लंबी यात्रा मासों में, मासों की दिनों में और दिनों की घंटों में होने लगी है। सागर के विशाल वक्षस्थल को सरलता से पार किया जा सकता है। विहग के समान गगन की सैर की जा सकती है। सच तो यह है कि विज्ञान ने ब्रह्मांड का रूप ही बदल दिया है।
इसके विद्युत आविष्कार को ही लीजिए, बटन दबाते ही अंधकार दूर, शीतल समीर का बहना, सुमधुर संगीत का स्रोत तथा चलचित्रों द्वारा अभिनय को देखना सरल हो गया है। इतना ही नहीं, कुछ ही पलों में अच्छे-से-अच्छे पकवान लीजिए, कपड़ों के मैल को दूर कर लीजिए,
बड़ी-से-बड़ी मशीनों को चलाकर इच्छित वस्तुएँ बना दीजिए, गरमी में शीतलता और सरदी में उष्णता पा लीजिए। घर बैठे देश-विदेश के समाचार सुन लीजिए। दूर-दूर देशों में बसे संबंधियों व मित्रों से घर बैठे ही बातें कर लीजिए। टेलीविज़न द्वारा उनकी आकृति भी देख लीजिए और ज्ञानवर्धन भी कीजिए। आज मुद्रण-कला द्वारा महान पुरुषों की वाणी को सदैव के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है। विश्व में घटने वाली घटनाओं को चाहे समाचारपत्रों में पढ़ लीजिए। या टी.वी. पर प्रत्यक्ष देख लीजिए। इस युग में प्राणी के अंग-अंग में विज्ञान समाया हुआ है।

चिकित्सा के क्षेत्र में भी विज्ञान की देन अद्वितीय है। संतति-निरोध के लिए नवीनतम |आविष्कारों का प्रयोग किया जा रहा है। टब खाँसी जैसे भयंकर रोग की रोकथाम के लिए 'एरोस्पेरिन' नामक पदार्थ से औषधि का निर्माण किया जा रहा है। छूत के रोगों से बचने के लिए मिट्टा के प्रयोग किए जा रहे हैं। जयेला के खेत की मिटटी दवारा 'क्लोरीमाइसिटान नामक औषधि का निर्माण हुआ। अफीम द्वारा मार्फीन के इंजेक्शन तैयार किए गए है जिसक कुछ समय के लिए असह्य वेदना को रोकने के लिए किया जाता है। इस के लिए किया जाता है। इसके अतिरिक्त मार्फीनों से भी शक्तिशाली 'मोटीपीन' नामक औषधि का निर्माण किया, जिसका प्रयोग कैंसर के रोग के लिए किया जा रहा है। इसके अलावा कैंसर जैसे भयंकर रोग के लिए रेडियम की किरणों को काम में लिया जाने लगा है। अब इससे भी अधिक शक्तिशाली कोबाल्ट किरणों को काम में लिया जा रहा है। इसके प्रयोग से कैंसर को दूर करने का प्रयल किया जा रहा है।

चेकोस्लोवाकिया के वैज्ञानिकों ने खाद्य पदार्थों के अनुसंधान में बलाटन की 'बेहम' बनस्पति
अनुसंधानशाला में इस प्रकार का आलू उपजाया है जिसका जायका सेव जैसा होता है। उसे सेब के
समान कच्चा भी खाया जा सकता है। इसमें विटामिन की अधिकता है। इसके अतिरिक्त मस्तिष्क
संबंधी यंत्रों के विषय में भी अनेक अनुसंधान हो रहे हैं। इन यंत्रों दवारा गणित, इतिहास और आधुनिक घटना संबंधी प्रश्नों के उत्तर दिए जा सकते हैं, कागज उठाया जा सकता है। पानी की बंदूक से आत्मरक्षा की जा सकती है। रेडियो-ऐक्टिव आइसोटोपों की सहायता से एक्स-रे यंत्र का निर्माण किया गया है। वज़न से लदी हई गाड़ियाँ, ट्रक आदि का भार तोलने के लिए, सफ़री तराजुओं का निर्माण हुआ है।

मनोरंजन के साधनों में रिकार्डप्लेयर तैयार किए गए हैं जो निरंतर नब्बे मिनट से अधिक समय तक बैटरी या बिजली से चलकर मनोरंजन कर सकते हैं। श्री-डी पिक्चर्स दवारा किसी भी दृश्य को उसके रूप में देखा जा सकता है। ऐसा सुना जाता है कि अब विज्ञान में ऐसे
प्रयत्न किए जा रहे हैं कि दर्शक उपवन का दृश्य आने पर वहाँ की महक का भी आनंद ले - सकेंगे। 'हरमन' कोहेन ने एक फुट लंबे ऐसे कृषि यंत्र का निर्माण किया है जो जोतने, बोने, भूमि को समतल बनाने के कई कार्यों को एकसाथ पूरा कर सकता है। सौर-ऊर्जा द्वारा चालित
चूल्हे का निर्माण तो अब भारत में भी हो चुका है।
विज्ञान वरदानदाता के रूप में हमारे सम्मुख आया किंतु कुछ स्वार्थी राष्ट्रों ने इसे अभिशाप के रूप में परिवर्तित कर दिया है।

 जापान के प्रसिद्ध नगर 'हिरोशिमा' और 'नागासाकी' का अणुबम द्वारा विध्वंस अमेरिका की बर्बरता को आज भी सिद्ध कर रहा है। अणुबम और उद्जन बमों के निरंतर परीक्षण किए जा रहे हैं। 'जिन' नामक एक ऐसे हेलीकॉप्टर का निर्माण किया जा चुका है, जिसकी गति 75 हजार कि.मी. प्रति घंटा है। इसी प्रकार के और भी कितने ही नरसंहारक यंत्रों का निर्माण हो चुका है। इनके अलावा दिए गए विज्ञान के सुख-साधनों को भी मानव नहीं भुला सकता है, फिर भी वह तृप्त नहीं हुआ है, उसे संतष्टि नहीं मिली है। आज का युग 'यंत्र का युग' नाम से प्रसिद्ध है। यही देश में बेकारी को बलाने वाला है।
इस रूप में विज्ञान का वरदान अभिशाप बनता जा रहा है। राष्ट्र की उन्नति के लिए कितनी ही अंतर्राष्ट्रीय योजनाएँ बनाई जा रही है। परंतु अधिकांश आडंबर मात्र ही हैं। आंतरिक रूप से एक देश दूसरे देश को आतंकित करने के प्रयास में जुटा हुआ है। इन सब बातों को देखते
हए यह निश्चय करना असंभव है कि विज्ञान आज मानव को शांति की राह पर ले जा रहा हैअथवा विध्वंस की ओर।

अंत में इतना ही कहा जा सकता है कि आधुनिक युग का विज्ञान एक महान शक्ति है। इसका उपयोग कल्याण एवं संहार दोनों ही रूपों में किया जा सकता है। अणुशक्ति जहाँ नरसंहार कर सकती है वहीं उद्योग-धंधों एवं कृषि को प्रगति के पथ पर भी खड़ा कर सकती है। यह सब
कुछ मानव प्रकृति पर ही अवलंबित है। यदि आज की राजनीति स्वार्थपरता से दूर हो जाए तो सारा विश्व विज्ञान के वरदान से सुखी एवं वैभवशाली बन सकता है अन्यथा नहीं।

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