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Friday, May 1, 2020

अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस

अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस 


 दुनिया भर के लगभग 80 देशों में 1 मई  को मजदूर दिवस के रूप में  मनाया जाता है। सकल घरेलू उत्पात यानि जीडीपी में योगदान देने वाले क्रिया कलापों  को आर्थिक क्रियाकलाप कहा जाता है जो व्यक्ति इन क्रियाओं में संलग्न है वे श्रमिक व मजदूर है। मजदूरी का इतिहास लंबा है,  परंतु पश्चिम के औद्योगिक क्रांति में इसका व्यापक स्तर पर सवरूप बदला।

अब मशीनीकरण हो चूका था। यूरोप और अमेरिका को भारत,  श्रीलका, अफ्रीका जैसी तमाम देश बाज़ार के रूप में मौजूद थे। जहाँ वे अपना उत्पादन बेच लाभ कमा सकते थे। उद्योगपतियों के लाभ का सबसे अधिक खामियाजा अगर भुगदना पड़ा तो वो मजदूर थे। अब मजदूरों को बाज़ार मांग पूरा करने के लिए  अधिक और तीव्र गति से काम करना पड़ता। अधिक लाभ कमाने के चक्कर के उधोगपति वेतन भी बढ़ाने को तैयार नही थे। 

अधिक परिश्रम, कम पारिश्रमिक के वजह से मजदूर काफ़ी आहत थे। और यह अंतराष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मानाने की नींव थी। 1886 में अमेरिका के मजदूर  संघठनों तय किया की अब वे 8 घंटे से ज्यादा कम नही करेंगे, इसके लिए उन्होंने हड़तालें और प्रदर्शन किये। इसी दौरान शिकांगो के हेमार्केट में बम धमाका हुए, पुलिस ने निष्कर्ष में किसानों को दोषी मानते हुए उनपर गोलिया चला दी। जिसमे कई लोग मारे और सौ से ज्यादा घायल हुए। उसके कुछ वर्षो बाद 1889 में अंतरर्राष्ट्रीय समाजवादी सम्मलेन में तय किया गया की हेमार्केट में मारे गए निर्दोष लोगों के याद में 1 मई को अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस मनाया जायेगा। और उस दिन सभी कामगारों और श्रमिकों को अवकाश दिया जायेगा। 

भारत में मजदूर दिवस की शुरुआत  


भारत में मजदूर दिवस 1मई,  1923 से मनाया जाता है। मजदूर जिसके कंधे पे भारत की अर्थव्यवस्था खड़ी है उसको सम्मान देने के लिए यह दिन बहुत आवश्यक है। भारत में मजदूर दिवस की शुरुआत करने का श्रेय लेबर किसान पार्टी के नेता कामरेड सिंगरावेलू चेट्यार को जाता है। हम इसे मई दिवस के रूप में भी मानते है। 

भारत में मजदूरों की हालत 


मजदूरों ने लम्बे संघर्ष का सामना किया है। मजदूरों के सामने समस्या ही थी,  कि कार्लमार्क्स के एक आहन 'दुनियां के मजदूरों एक हो' ने मजदूरों को एक वर्ग के रूप में खड़ा हो गया। ये मजदूरों की समस्या ही थी,  कि एक विचारधारा का सूत्रपात कर दिया, ये मजदूरों कि समस्या ही थी कि रूस जैसी साम्यवादी राष्ट्र का उदय हुआ और वह अमेरिका जैसे पूँजीवादी देश से लगभग 4 दशक तक शीत युद्ध लड़ा। 

शहरी और ग्रामीण क्षेत्र की असमानता 

भारत में इसका प्रभाव देर से हुआ।  क्योंकि भारत मुलत: कृषि प्रधान देश है, लेकिन पिछले दशकों में भारत में कृषि पर निर्भरता कम हुई है। जिस कारण कृषि इतर कार्यों में मजदूरी बढ़ी है। पर मजदूरों के संदर्भ में कई समस्या देखने कों मिली है। एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर 100 में से 39 व्यक्ति श्रमिक है, शहरी क्षेत्रों में यह अनुपात 36 है जबकि ग्रामीण भारत में यह 40 है। यह जान तोड़ा अटपटा लगता है कि सारी फ़ैक्टरिया शहर में और मजदूर सबसे ज्यादा ग्रामीण इलाके में ये कैसे? दरअसल मजदूर बनना ग्रामीण इलाकों के वयक्तियों के लिए समस्या है। ग्रामीण क्षेत्रों में उच्च आय के अवसर सीमित हैं, इसी कारण रोजगार बाज़ार में उनकी भागीदारी अधिक है। अधिकांश व्यक्ति स्कूल, महाविद्यालय या किसी प्रशिक्षण संस्थान में नहीं जा पाते। यदि कुछ जाते भी हैं तो वे बीच में ही छोड़कर श्रमशक्ति में शामिल हो जाते हैं। शहरी क्षेत्रों में एक बड़ा भाग विभिन्न शैक्षिक संस्थाओं में अध्ययन कर सकने में सक्षम है। शहरी जनसमुदाय को रोजगार के भी विविधतापूर्ण अवसर सुलभ हो जाते हैं। वे अपनी शिक्षा और योग्यता के अनुरूप रोजगार की तलाश में रहते हैं। किंतु ग्रामीण क्षेत्र के लोग घर पर नहीं बैठ सकते, क्योंकि उनकी आर्थिक दशा उन्हें ऐसा नहीं करने देती है। समान रूप से रोजगार के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा के अनुसार रोजगार पाना सभी नागरिक का प्राकृतिक तथा मौलिक अधिकार है। और प्रतिभा विकसित करने में सहायक कि भूमिका निभाना सरकार का कर्तव्य। 

लैंगिक असमानता 

भारत में मजूदरों के समक्ष दूसरी समस्या लैंगिक असमानता का है। भारत में श्रमशक्ति में पुरुषों की बहुलता है। श्रमबल में लगभग 70 प्रतिशत पुरुष तथा शेष महिलाएँ तथा बाल श्रमिक हैं। ग्रामीण क्षेत्र में महिला श्रमिक कुल श्रमबल का एक तिहाई हैं, तो शहरों में केवल 20 प्रतिशत महिलाएँ ही श्रमबल में भागीदार पाई गई हैं। महिलाएँ खाना बनाने, पानी लाने, ईंधन बीनने के साथ-साथ खेतों में भी काम करती हैं। उन्हें नकद या अनाज के रूप में मजदूरी नहीं मिलती-कितने ही मामलों में तो कुछ भी भुगतान नहीं किया जाता। इसी कारण इन महिलाओं को श्रमिक वर्ग में भी शामिल नहीं किया जाता। अर्थशास्त्रियों का आग्रह है कि इन महिलाओं को भी श्रमिक ही माना जाना चाहिए।इसके अलावा जो महिलाएं कार्यरत है, उन्हें पुरुषों के तुलना में कम वेतन दिए जाना, कार्य क्षेत्र में यौनउत्पीड़न, अत्यधिक कार्य लिया जाना, आदि अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। 

बाल मजदूरी 

 बाल मजदूरी देश की गंभीर समस्याओं में से एक है, यह देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। भारतीय संविधान के भाग 3  मौलिक अधिकार में शोषण और अन्याय के विरुद्ध अधिकार, अनुच्छेद 23 के अंतर्गत ख़तरनाक उद्योगों में बाल श्रम पर निषेध है। इसके आलावा 1948 का फैक्ट्री लॉ तथा 1986 का बाल श्रम निषेध अधिनियम पारित हुआ है। इन कानूनों के तहत 14 साल से कम उम्र के बच्चे कों कम करने के लिए बाध्य नही किया जा सकता और ना हि किसी ख़तरनाक उद्योग में 14से 18 साल के बच्चे कों 4(1/2) ज्यादा काम कराया जा सकता है। बच्चों का सही स्थान स्कूल है। काम उम्र में काम करने से मानसिक शारीरिक, आत्मिक विकास अवरूद्ध होता है। लेकिन इस पर देश की हालत क्या है जग जाहिर है। चाहे कानपुर का चमड़ा उद्योग हो या फिरोजाबाद की चूड़ियों का उद्योग इन सभी ख़तरनाक उधोगों में बच्चे काम करते दिख जायेगे। हमें रोज़ होटलों में, दुकानों में ई रिक्शा चालक के रूप में बच्चे काम करते दिख जायेगे। हमें ऐ ध्यान रखना चाहिए की ऐ बच्चे ही देख के भविष्य है सरकार की जिम्मेदारी है की कानून का सख़्ती से पालन कराये और हमारा कर्तव्य है की बाल मजदूरी का विरोध करें। 

काम के घंटे और वेतन की समस्या 

विश्व मजदूर दिवस काम के घंटे कों लेकर शुरू हुआ था, परंतु भारत की स्थिति आज सरकारी क्षेत्र कों छोड़ दे तो सही नही नही प्राइवेट कंपनियों में आज भी 12 घंटे तक काम लिया जाता है अगर असंघटित क्षेत्रों की बात करें तो यह  और अधिक हो जाता है। आज अधिकतर मजदूर कम वेतन कों लेकर परेशान है हालांकि राज्यों ने न्यूनतम मजदूरी दर तय कर रखा है, परंतु वह सिर्फ कागज पर नजर आता है। मजदूरी भुगतान कानून 1936, न्यूनतम मजदूरी कानून 1948, बोनस भुगतान कानून 1965 और समान पारिश्रमिक अधिनियम 1976 तथा कोड ऑन वेजेस जैसे कानून मौजूद है परंतु न्यूनतम वेतन तय करने के लिए ट्रेड यूनियनों, नियोक्ताओं और राज्य सरकार के प्रतिनिधियों की त्रिपक्षीय समिति की आपसी सहमति आवश्यक है। 

प्रवास की समस्या 

भारत में मजदूरी के तलाश में दूसरे राज्यों में सफर करने वाले मजदूरों की संख्या ज्यादा है। भारत में लाखों मजदूर गावों से निकल कर शहरों में जाते है वहा बुरी स्तिथि में रहने कों मजबूर होते है जिन कारणों से उन्हें कई बीमारियों का सामना करना पड़ता है। जो मजदूर अपने परिवार के साथ जाते है उने आर्थिक परेशानिया घेर लेती है। ऐसी स्थिति में रोजगार की तलाश में प्रवास उचित नही लगता है। वैसे भी महात्मा गाँधी का विचार था कि हमारे गांव संपूर्ण रूप से इतना संपन्न हो की सभी व्यक्ति अपनी जरूरतों कों वही पूरा कर सके।यही कारण है कि पंचायती वयवस्था पर जोर दिया जा रहा है। इसे और सशक्त करने की जरुरत है। 

निष्कर्ष 

समस्याएं बहुत है हम हर साल एक मई कों मजदूर दिवस मानते है और यह मजदूरों कों उनके कार्य के सम्मान के लिए आवश्यक भी है। लेकिन ऐ भी वास्तविकता है कि अधिकतर मजदूरों कों इस दिवस के बारे में नही पता और ना ही उने सरकार द्वारा चलायी जा रही विभिन्न योजनाओं की जानकारी मील पाती है। आज जरुरत है इनकी दसा में सुधार करने की तभी वास्तविकता में हम इस दिवस कों खुशियों की तेवहार के रूप में मना पाएंगे। 




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