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Sunday, May 3, 2020

विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस और भारत में पत्रकारों की स्वतंत्रता

विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस और भारत में पत्रकारों की स्वतंत्रता


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Freedom of press 

दुनिया भर में 3 मई को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है। सबसे पहले 1991 में अफ्रीका के पत्रकारों ने प्रेस की स्वतंत्रता के लिए पहल की थी। 3 मई की तारीख को प्रेस की आजादी के सिद्धांतों से संबंधित एक बयान जारी किया था,  जिसे decleration of windhoek के नाम से जाना जाता है। उसी के एक साल बाद दूसरी जयंती पर 1993 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने पत्रकारिता की स्वतंत्रता और गरीमा को बनाये रखने के लिए हर साल 3 मई को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस मानाने का एलान किया तब से लेकर 3 मई का दिन पत्रकारों के लिए महत्वपूर्ण है।

किसी भी देश के पत्रकारों के लिए उस देश में बहुलवाद का स्वर क्या है?,मीडिया की आजादी कितनी है? मिडिया के लिए वातावरण क्या है?, उस देश में सेंसरशिप जैसे कानून तथा सूचना के लिए मौजूदा बुनियादी ढांचा आदि काफ़ी मायने रखता है। दुनिया के 180 देशों में पत्रकारों के स्वतंत्रता की निगरानी रखने वाली पेरिस स्थित गैर सरकारी संस्था रिपोर्टर विदाउट बॉर्डर्स ने विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक -2020 जारी की है। सूचकांक से  दुनिया भर में पत्रकारों की स्थिती काफ़ी चिंताजनक लगती है। 180 में सिर्फ 8% देशों में पत्रकारों की स्थिति सामान्य है। 

दुनिया भर में पत्रकारों की जो स्थिति है उसपर विचार करना आवश्यक है। चीन, दक्षिण कोरिया आदि देशों में  पत्रकार सरकार के खिलाफ कुछ बोल नही सकते, अभी हाल ही में सउदी अरब के पत्रकार लेखक जो अल-अरब -न्यूज़ -चैनल के प्रधान संपादक थे, शाह परिवार के खिलाफ लिखने के कारण पहले तो  देश छोड़ने के लिए मजबूर किया गया, जब शाह के खिलाफ लिखना नही छोड़ा तो इस्तांबुल के अरब वाणिज्य दूतावास में उनकी हत्या कर दी गयी। इससे ज्यादा अफ़सोस जनक है कि अमेरिका जैसे देश स्पष्ट तौर से जानते हुए कि शाह परिवार का हाथ है, अपनी विदेश रणनीति के कारण इसपे चुप रहना ही सही समझा। यह प्रश्न उठना स्वभाविक है कि आखिर पत्रकारों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित हो? 

विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत को 180 देशों में भारत को 142 स्थान प्राप्त हुआ है। भारत जैसे बड़े लोकतान्त्रिक देश में पत्रकारों के स्वतंत्रता के सम्बन्ध में इतना पीछे होना काफ़ी चिंताजनक है। जबकि हमारी आजादी की लड़ाई में जमीन तैयार करने में पत्रकारिता जगत का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक, लाला लाजपत राय, अबुल कलाम आजाद तथा डॉ राजेंद्र प्रसाद आदि क्रांतिकारियों ने समाचार पत्रों के माध्यम से लोगों में स्वतंत्रता की चिंगारी जलाने का काम किया था। इसके अलावा भारत एक लोकतान्त्रिक देश भी है, किसी भी लोकतान्त्रिक देश में प्रेस विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका तीनों ही अंगों पर नजर रखती है। इसी कारण इसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ भी कहा जाता है। प्रेस समय -समय पर नागरिकों को सचेत, जागरूक, शिक्षित और प्रगतिवादी बनाती है तथा प्रेस सरकार और नागरिकों के बीच माध्यम के रूप में भी कार्य करती है। ऐसे में भारत जैसे देश में पत्रकारिता और पत्रकारों की स्वतंत्रता काफ़ी महत्वपूर्ण हो जाती  है। 

बीते साल 2018 में भारत में 5 पत्रकारों की हत्या कर दी गयी थी। हालांकि 2019 में किसी पत्रकार की हत्या नही हुई लेकिन सूचकांक में भारत 140 वे स्थान से 142 स्थान पर पहुंच गया है,  यानि 2 अंको का नुकसान हुआ है। इसलिए यह  जानना आवश्यक है कि किन वजहों से पत्रकारिता की स्वतंत्रता खतरे में है। पेशेवर रिपोर्टिंग या फिर खोजी पत्रकारिता स्वतंत्रता आज के समय में पत्रकारों के लिए काफ़ी जोखिम का काम बन गया है। पत्रकारों को धमकी, हत्या,  खरीद आदि पत्रकारिता को कमजोर कर रहा है। अब यह देखा जा रहा है की कई बड़े प्रेस का संचालन नेताओं द्वारा किया जा रहा है या फिर संचालक किसी ना किसी पार्टी से जुड़ कर राज्य सभा या लोकसभा टिकट पा जाते है। ऐसे में पत्रकारिता को निष्पक्ष रूप में देखना काफ़ी संदेहपरक हो जाता है। अख़बार का संचालन करना अब बड़ी पूंजी का खेल है, ऐ बहुत अहम् है की एक अख़बार जो हमें 3 से 4 रूपए में मील जाता है उसे बनाने का कुल लागत 20 से 25 रूपये आता है। ऐसे में प्रेस इंडस्ट्री पूरी तरह से पूजीपतियों का खेल बना हुआ है। , क्योंकि कोई भी पूँजीपति सबसे पहले अपना लाभ देखने लगता है। ऐसे से पत्रकरिता की निष्पक्षता की गुंजाईश कम नजर आती है। 

प्रश्न उठता है कि क्या पत्रकारिता भी अपनी  समस्याओं के लिए जिम्मेदार है?हाल के वर्षों में पत्रकारों पर  सरकार का पक्ष लेने का आरोप, एक तरफ़ा सरकार का विरोध करने का आरोप, गैर जरुरी मुद्दों को प्रसारित करने तथा समाचार की गंभीरता को समाप्त करने का आरोप लगा है। पत्रकारों के लिए यह ध्यान रखना आवश्यक है कि पत्रकार किसी पार्टी या सरकार के प्रवक्ता नही है और ना ही किसी विचारधारा के प्रचारक, पत्रकारिता अपने आपको में एक विचारधारा है। जो जैसा है उसे उसी तरह जनता के सामने रखना ही पत्रकारिता का धर्म है। अगर आप सरकार की आलोचना करते है तो उसके बेहतरीन कार्यों की तारीफ भी करनी चाहिए। हाल के वर्षों में देखा जा रहा है कि कई पत्रकार ट्विटर या फेसबुक पर किसी पार्टी के प्रवक्ता की तरह काम करते है और न्यूज़ एंकरिंग करते समय एक निष्पक्ष पत्रकार का रोल निभाते है। भारतीय संविधान ने सबको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दिया हुआ है लेकिन कही न कही पत्रकारों को यह ध्यान में रखना चाहिए की लोग जो आपको ट्विटर और फेसबुक पे देख रहे है, क्या वह आपको निष्पक्ष पत्रकार समझ रहे है? मीडिया के दो भागों में बटने का यही कारण तो नही है? 

आज पत्रकारिता की स्वतंत्रता और गरिमा बनाये रखने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाने की जरूरत है।सरकार को चाहिए की पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करें,पत्रिकारिता को स्टार्ट अप के अंतर्गत लाकर पत्रकारिता की संचालन की चाह रखने वालो को कम बयाज दरों में रुपये की व्यवस्था की जानी चाहिए, पत्रकारों को कोई लालच न दे सके इसके लिए शख्त कानून बनाने , मीडिया सरकार के नियंत्रण से मुक्त रहे इसके लिए अलग ट्रिब्यूनल तथा समिति बनाने की जरुरत है। 

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