Christmas Tree Ka Chalan Kaise Aarambh Hua

Christmas Tree Ka Chalan Kaise Aarambh Hua क्रिसमस ट्री का चलन कैसे आरंभ हुआ ?

क्रिसमस (Christmas) के बारे में सोचते हुए कौन – सी दो चीजें तुम्हारे दिमाग में आती हैं ? निश्चित रूप से सांता क्लॉज व क्रिसमस ट्री । क्या तुम जानते हो कि क्रिसमस ट्री का इस्तेमाल कब और कैसे आरंभ हुआ ? 

     क्रिसमस (Christmas) ट्री सदा हरा रहने वाला पेड़ है , जो मोरवा या देवदार का पेड़ होता है । इसे बल्ब , घंटियों व रोशनी की लड़ियों से सजाया जाता है । क्रिसमस (Christmas) ट्री का प्रचलन प्राचीन मिस्र , चीन व हीब्रू संस्कृति की उस परंपरा से आया है , जिसमें वे सदा हरे रहने वाले पेड़ों की कतारों को शाश्वत जीवन का प्रतीक मानते थे । रोमवासी अपने मंदिरों को पेड़ों की हरी शाखाओं से सजाते थे ।

यूरोप के पागान समुदाय में पेड़ों की पूजा करने का प्रचलन उनके ईसाई धर्म अपनाने के बाद भी कायम रहा । इसके अंतर्गत बुरी आत्माओं को डराने के लिए नए साल में अपने घरों को सजाने की परंपरा व इस समय उड़ने वाले पक्षियों के लिए एक पेड़ लगाना शामिल था । 

आधुनिक क्रिसमस ट्री का जो रूप देखने को मिलता है , उसका मूल रूप जर्मनी में प्रचलित है। आदम और हौव्वा पर आधारित नाटक में ईडन गार्डन के प्रतीक के रूप में देवदार का पेड़ था , जिस पर सेब लटके हुए थे । 

        जर्मनवासी 24 दिसंबर को अपने घरों में ( पैराडाइज ट्री ) लगाते थे । इस दिन आदम व हौव्वा को धार्मिक भोज कराया जाता था । वे ट्री पर वैफर्स लटकाते थे । क्रिसमस की आकृतियां , मोमबत्ती व तारे को टांगे रखने के लिए लकड़ी के एक तिकोने पिरामिड का इस्तेमाल करते थे ।

16 वीं शताब्दी तक क्रिसमस पिरामिड और पैराडाइज ट्री का अस्तित्व समाप्त हो गया और क्रिसमस ट्री का आधुनिक रूपचलन में आ गया । उत्तरी यूरोप में क्रिसमस की सजावट का मुख्य आधार एक पेड़ ही होता है । 18 वीं शताब्दी तक आते – आते , यह परंपरा जर्मनी के लूथेरंस के बीच व्यापक रूप से फैल गई । 19 वीं शताब्दी के मध्य में महारानी विक्टोरिया के पति जर्मन प्रिंस अल्बर्ट द्वारा इस परम्परा को इंग्लैंड में प्रचलित किया गया । 

विक्टोरियन पेड़ को मोमबत्ती , टॉफी और केक से सजाया जाता था । इन चीजों को रिबन व कागज की लड़ियों द्वारा पेड़ों पर लटकाया जाता था । प्रिंस एल्बर्ट ने सन 1841 में ऐसा पहला पेड़ विंडसर राजमहल में लगाया था । 

17 वीं शताब्दी में जर्मन प्रवासी इस परंपरा को अमेरिका में ले आए । 19 वीं शताब्दी तक , यह पेड़ अमेरिका में चर्चित हो गया । ये पेड़ आस्ट्रिया , स्विटजरलैंड , पोलैंड और हॉलैंड में भी खूब प्रचलित हुआ । चीन व जापान में इस परम्परा का प्रचार 19 वीं व 20 वीं शताब्दी में अमेरिका के मिशनरियों ( धर्म प्रचारकों ) द्वारा किया गया ।

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